10
0 Likes
रात जब टूट कर बिखर जाए
जागने वाला फिर किधर जाए
जागने वाला फिर किधर जाए
उम्र गुज़री है जैसे कानों से
सरसराती हवा गुज़र जाए
अपनी यादें भी साथ ले जा तू
ये तिरा क़र्ज़ भी उतर जाए
तेज़ चलने में गिर न जाए कहीं
वक़्त से बोल दो ठहर जाए
अब तो तू भी नहीं है धड़कन में
दिल का क्या काम अब वो मर जाए
9
0 Likes
वो माहताब भी ख़ुशबू से भर गया होगा
जो चाँदनी ने तिरी ज़ुल्फ़ को छुआ होगा
जो चाँदनी ने तिरी ज़ुल्फ़ को छुआ होगा
तिरे लबों से जो निकला था इक तबस्सुम सा
मिरे लिए तो वही गीत बन गया होगा
लिखा है आज तिरा नाम मैं ने काग़ज़ पर
ये मेरा लफ़्ज़ भी इतरा के चल रहा होगा
मिरी पलक पे है एहसास जैसे मख़मल सा
तुम्हारा ख़्वाब उसे छू के चल दिया होगा
मुझे यक़ीन है तेरे ही सुर्ख़ गालों ने
धनक को शोख़ सा ये रंग दे दिया होगा
जो देखता है तिरा हुस्न रोज़ छुप छुप कर
उस आइने को भी तो इश्क़ हो गया होगा
8
0 Likes
7
0 Likes
सब है फ़ानी यहाँ संसार में किस का क्या है
फ़िक्र फिर भी है तुझे अपना पराया क्या है
फ़िक्र फिर भी है तुझे अपना पराया क्या है
आप का पहला ही अंदाज़ बता देता है
आप को आप के वालिद ने सिखाया क्या है
ज़िंदगी ख़ुद पे तू इतना भी गुमाँ मत करना
चंद साँसों के सिवा तेरा असासा क्या है
फिर से इक और लड़ाई के बहाने के सिवा
तुम बता दो कि किसी जंग से मिलता क्या है
उम्र भर कुछ न किया जिस की तमन्ना के सिवा
उस ने पूछा भी नहीं मेरी तमन्ना क्या है
कुछ ग़रीबों की गली में भी दिए जल जाएँ
इस से बेहतर भी दिवाली का उजाला क्या है
कोई जज़्बा कोई एहसास न धड़कन है कोई
ये अगर दिल है मिरे दोस्त तो सहरा क्या है
दाम मन-माने उसे दे के ख़रीदा तू ने
देख तो ले तुझे बाज़ार ने बेचा क्या है
वही भूके वही आहें वही आँसू हैं 'सहाब'
शहर का नाम बदल जाने से बदला क्या है
6
0 Likes
5
0 Likes
हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के
रातें थीं क़र्ज़ की यहाँ दिन थे उधार के
रातें थीं क़र्ज़ की यहाँ दिन थे उधार के
जैसे पुराना हार था रिश्ता तेरा मेरा
अच्छा किया जो रख दिया तू ने उतार के
दिल में हज़ार दर्द हों आँसू छुपा के रख
कोई तो कारोबार हो बिन इश्तिहार के
क्या जाने अब भी दर्द को क्यूँ है मेरी तलाश
टुकड़े भी अब कहाँ बचे इस के शिकार के
शायद ज़बाँ पे क़र्ज़ था हम ने चुका दिया
ख़ामोश हो गए हैं तुझे हम पुकार के
ऐसे सुलग उठा तेरी यादों से दिल मेरा
जैसे धधक उठें कहीं जंगल चिनार के
4
0 Likes
तन्हाइयों में अश्क बहाने से क्या मिला
ख़ुद को दिया बना के जलाने से क्या मिला
ख़ुद को दिया बना के जलाने से क्या मिला
मुझ से बिछड़ के रेत सा वो भी बिखर गया
उस जाने वाले शख़्स को जाने से क्या मिला
अब भी मिरे वजूद में हर साँस में वही
मैं सोचता हूँ उस को भुलाने से क्या मिला
तू क्या गया कि दिल मिरा ख़ामोश हो गया
इन धड़कनों के शोर मचाने से क्या मिला
अपने ही एक दर्द का चारा न कर सके
सारे जहाँ का दर्द उठाने से क्या मिला
जिस के लिए लिखा उसे वो तो न सुन सका
वो गीत महफ़िलों को सुनाने से क्या मिला
उन का हर एक हर्फ़ है दिल पर लिखा हुआ
उस दोस्त के ख़तों को जलाने से क्या मिला
सोचो ज़रा कि तुम ने ज़माने को क्या दिया
क्यूँ सोचते हो तुम को ज़माने से क्या मिला
3
0 Likes
2
0 Likes
1
0 Likes










