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सारी दुनिया की निगाहों से बचाकर रखना,
अपनी आँखों में ही हर दर्द का ज़ेवर रखना
अपनी आँखों में ही हर दर्द का ज़ेवर रखना
उस को आदत ये परेशान बहुत रक्खेगी,
उस की आदत थी मेरा हाथ पकड़ कर रखना
इस का क्या शिकवा उसे रोक नहीं पाए हम,
एक मुफ़लिस को कहाँ आता है ज़ेवर रखना
हाए! वो इश्क़ छिपाने के ज़माने मोहन!
याद आता है ग़लत नाम से नंबर रखना
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हमारा इश्क़ इबादत का अगला दर्जा है
ख़ुदा ने छोड़ दिया तो तुम्हारा नाम लिया
ख़ुदा ने छोड़ दिया तो तुम्हारा नाम लिया
ग़मों से बैर था सो हम ने ख़ुद-कुशी कर ली
शजर ने गिर के परिंदों से इन्तेक़ाम लिया
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जो शे'र समझे मुझे दाद वाद देता रहे
गले लगाए जिसे ग़म समझ में आ जाए
गले लगाए जिसे ग़म समझ में आ जाए
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हाए वो इश्क़ छुपाने के ज़माने 'मोहन'
याद आता है ग़लत नाम से नंबर रखना
याद आता है ग़लत नाम से नंबर रखना
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