सियाह रात की सरहद के पार ले गया है
    अजीब ख़्वाब था आँखें उतार ले गया है

    है अब जो ख़ल्क़ में मजनूँ के नाम से मशहूर
    वो मेरी ज़ात से वहशत उधार ले गया है

    Abhishek shukla
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    उस से कहना की धुआँ देखने लाएक़ होगा
    आग पहने हुए मैं जाऊँगा पानी की तरफ़

    Abhishek shukla
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    पा ए उम्मीद प रक्खे हुए सर हैं हम लोग
    हैं न होने के बराबर ही मगर हैं हम लोग

    तू ने बरता ही नहीं ठीक से हम को ऐ दोस्त
    ऐब लगते हैं बज़ाहिर प हुनर हैं हम लोग

    Abhishek shukla
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    ये इत्तेफ़ाक़ ज़रूरी नहीं दोबारा हो
    मैं तुमको सोचने बैठूं तो ज़ख्म भर जाएँ

    Abhishek shukla
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    चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है
    रस्ता नहीं मंज़िल नहीं अच्छा हुआ तू है

    Abhishek shukla
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    मैं चोट कर तो रहा हूँ हवा के माथे पर
    मज़ा तो जब था कि कोई निशान भी पड़ता

    Abhishek shukla
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    मैं सोचता हूँ बहुत ज़िंदगी के बारे में
    ये ज़िंदगी भी मुझे सोच कर न रह जाए

    Abhishek shukla
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    सफ़र के बाद भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए
    ख़याल ओ ख़्वाब में अब के भी घर न रह जाए

    Abhishek shukla
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    ये जो दुनिया है इसे इतनी इजाज़त कब है
    हम पे अपनी ही किसी बात का ग़ुस्सा उतरा

    Abhishek shukla
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    ये आग वाग का दरिया तो खेल था हम को
    जो सच कहें तो बड़ा इम्तिहान आँसू हैं

    Abhishek shukla
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