Ameer Minai

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    उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
    ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ




    डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा
    कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ




    ज़ब्त कम-बख़्त ने याँ आ के गला घोंटा है
    कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ




    नक़्श-ए-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सज्दे
    सर मिरा अर्श नहीं है जो झुका भी न सकूँ




    बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को
    ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ




    इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर
    अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ

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    तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा
    मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है

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    जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा
    हया यक-लख़्त आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता

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    फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा
    कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा

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    अभी आए अभी जाते हो जल्दी क्या है दम ले लो
    न छेड़ूँगा मैं जैसी चाहे तुम मुझ से क़सम ले लो

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    तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर
    सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर

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    कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहीं
    शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर

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    गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है 'अमीर'
    क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना

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    ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'
    सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

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    कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं
    नाख़ुदा जिन का नहीं उन का ख़ुदा होता है

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