Nida Fazli

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    कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है
    आते जाते रात और दिन में कुछ तो जी बहलाने को है

    चलो यहाँ से अपनी अपनी शाख़ों पे लौट आए परिंदे
    भूली-बिसरी यादों को फिर तन्हाई दोहराने को है

    दो दरवाज़े एक हवेली आमद रुख़्सत एक पहेली
    कोई जा कर आने को है कोई आ कर जाने को है

    दिन भर का हंगामा सारा शाम ढले फिर बिस्तर प्यारा
    मेरा रस्ता हो या तेरा हर रस्ता घर जाने को है

    आबादी का शोर-शराबा छोड़ के ढूँडो कोई ख़राबा
    तन्हाई फिर शम्अ जला कर कोई हर्फ़ सुनाने को है

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    नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
    कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है

    मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं
    जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है

    मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे
    सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है

    चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं
    जो मौत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है

    हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में
    जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है

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    दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए
    जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए

    यूँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने
    कोई न हो तो ख़ुद से उलझ जाना चाहिए

    झुकती हुई नज़र हो कि सिमटा हुआ बदन
    हर रस-भरी घटा को बरस जाना चाहिए

    चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं
    कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए

    अपनी तलाश अपनी नज़र अपना तजरबा
    रस्ता हो चाहे साफ़ भटक जाना चाहिए

    चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त
    इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए

    बिजली का क़ुमक़ुमा न हो काला धुआँ तो हो
    ये भी अगर नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए

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    दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
    मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है

    अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम
    हर वक़्त का रोना तो बे-कार का रोना है

    बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
    किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

    ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है
    हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है

    ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं
    फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

    आवारा-मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
    आकाश की चादर है धरती का बिछौना है

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    अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
    रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

    पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
    अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

    वक़्त के साथ है मिटी का सफ़र सदियों से
    किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

    चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
    सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं

    हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार
    अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं

    गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
    हर क़लमकार की बे-नाम ख़बर के हम हैं

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    सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
    सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

    किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
    तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

    यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
    मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो

    कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा
    ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो

    यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें
    इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

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    कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
    कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

    तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
    जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

    कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
    छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

    ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
    ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

    चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
    ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

    Nida Fazli
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    हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी
    और वो समझे नहीं ये ख़ामुशी क्या चीज़ है

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    धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
    ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

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    हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
    जिस को भी देखना हो कई बार देखना

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