Kumar Vishwas

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    बात करो रूठे यारों से सन्नाटों से डर जाते हैं
    प्यार अकेला जी लेता है दोस्त अकेले मर जाते हैं

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    दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला
    बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला
    शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो
    होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
    होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

    बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में
    बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में
    जीते-जी इसका मान रखें
    मर कर मर्यादा याद रहे
    हम रहें कभी ना रहें मगर
    इसकी सज-धज आबाद रहे
    जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो
    होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
    होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

    गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें
    हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें
    परवरदिगार,मैं तेरे द्वार
    पर ले पुकार ये आया हूं
    चाहे अज़ान ना सुनें कान
    पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें
    जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो
    होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
    होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

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    मुद्दतें गुज़र गयी 'हिसाब' नहीं किया
    न जाने अब किसके कितने रह गए हम

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    खुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना
    इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना

    देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना
    ये सारे खेल हैं, इनमें उदास मत होना

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    फिर मिरी याद आ रही होगी
    फिर वो दीपक बुझा रही होगी

    फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो
    ख़ुद को बैनर बना रही होगी

    अपने बेटे का चूम कर माथा
    मुझ को टीका लगा रही होगी

    फिर उसी ने उसे छुआ होगा
    फिर उसी से निभा रही होगी

    जिस्म चादर सा बिछ गया होगा
    रूह सिलवट हटा रही होगी

    फिर से इक रात कट गई होगी
    फिर से इक रात आ रही होगी

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    कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
    मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है

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    कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
    मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है

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    तुम्हारा फ़ोन आया है

    अजब सी ऊब शामिल हो गयी है रोज़ जीने में
    पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में
    महज मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर
    हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर
    अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं
    उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं
    मेरे कमरे के सन्नाटे ने अंगड़ाई सी तोड़ी है
    मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़मा गुनगुनाया है
    तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

    सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में
    कि जैसे छठ के मौके पर जगह मिल जाए गाड़ी में
    मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे
    ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़्याली है, मगर जैसे
    बड़ी नाकामियों के बाद हिम्मत की लहर जैसे
    बड़ी बेचैनियों के बाद राहत का पहर जैसे
    बड़ी ग़ुमनामियों के बाद शोहरत की मेहर जैसे
    सुबह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे
    बड़े उन्वान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे
    नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे
    हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है
    मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है
    तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

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    कबूतर इश्क़ का उतरे तो कैसे?
    तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है

    इरादा कर लिया गर ख़ुदकुशी का
    तो ख़ुद की आँख का पानी बहुत है

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    सखियों संग रंगने की धमकी सुनकर क्या डर जाऊँगा
    तेरी गली में क्या होगा ये मालूम है पर आऊँगा

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