Afzal Khan

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    शिकस्त-ए-ज़िंदगी वैसे भी मौत ही है ना
    तो सच बता ये मुलाक़ात आख़िरी है ना

    कहा नहीं था मिरा जिस्म और भर यारब
    सो अब ये ख़ाक तिरे पास बच गई है ना

    तू मेरे हाल से अंजान कब है ऐ दुनिया
    जो बात कह नहीं पाया समझ रही है ना

    इसी लिए हमें एहसास-ए-जुर्म है शायद
    अभी हमारी मोहब्बत नई नई है ना

    ये कोर-चश्म उजालों से इश्क़ करते हैं
    जो घर जला के भी कहते हैं रौशनी है ना

    मैं ख़ुद भी यार तुझे भूलने के हक़ में हूँ
    मगर जो बीच में कम-बख़्त शाएरी है ना

    मैं जान-बूझ के आया था तेग़ और तिरे बीच
    मियाँ निभानी तो पड़ती है दोस्ती है ना

    Afzal Khan
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    नहीं था ध्यान कोई तोड़ते हुए सिगरेट
    मैं तुझ को भूल गया छोड़ते हुए सिगरेट

    सो यूँ हुआ कि परेशानियों में पीने लगे
    ग़म-ए-हयात से मुँह मोड़ते हुए सिगरेट

    मुशाबह कितने हैं हम सोख़्ता-जबीनों से
    किसी सुतून से सर फोड़ते हुए सिगरेट

    कल इक मलंग को कूड़े के ढेर पर ला कर
    नशे ने तोड़ दिया जोड़ते हुए सिगरेट

    हमारे साँस भी ले कर न बच सके 'अफ़ज़ल'
    ये ख़ाक-दान में दम तोड़ते हुए सिगरेट

    Afzal Khan
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    वो जो इक शख़्स वहाँ है वो यहाँ कैसे हो
    हिज्र पर वस्ल की हालत का गुमाँ कैसे हो

    बे-नुमू ख़्वाब में पैवस्त जड़ें हैं मेरी
    एक गमले में कोई नख़्ल जवाँ कैसे हो

    तुम तो अल्फ़ाज़ के नश्तर से भी मर जाते थे
    अब जो हालात हैं ऐ अहल-ए-ज़बाँ कैसे हो

    आँख के पहले किनारे पे खड़ा आख़िरी अश्क
    रंज के रहम-ओ-करम पर है रवाँ कैसे हो

    भाव-ताव में कमी बेशी नहीं हो सकती
    हाँ मगर तुझ से ख़रीदार को नाँ कैसे हो

    मिलते रहते हैं मुझे आज भी 'ग़ालिब' के ख़ुतूत
    वही अंदाज़-ए-तख़ातुब कि मियाँ कैसे हो

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    देर से आने पर वो ख़फ़ा था आख़िर मान गया
    आज मैं अपने बाप से मिलने क़ब्रिस्तान गया

    Afzal Khan
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    हमारे साँस भी ले कर न बच सके अफ़ज़ल
    ये ख़ाक-दान में दम तोड़ते हुए सिगरेट

    Afzal Khan
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    मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी
    मोहब्बत की कहानी में अदाकारी नहीं करनी

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    इतनी सारी यादों के होते भी जब दिल में
    वीरानी होती है तो हैरानी होती है

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    अब जो पत्थर है आदमी था कभी
    इस को कहते हैं इंतिज़ार मियाँ

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    बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो
    मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता

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    तू भी सादा है कभी चाल बदलता ही नहीं
    हम भी सादा हैं इसी चाल में आ जाते हैं

    Afzal Khan
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