मुझ से नफ़रत है अगर उस को तो इज़हार करे
कब मैं कहता हूँ मुझे प्यार ही करता जाए
सराए छोड़ के वो फिर कभी नहीं आया
चला गया जो मुसाफ़िर कभी नहीं आया
हर एक शय मिरे घर में उसी के ज़ौक़ की है
जो मेरे घर में ब-ज़ाहिर कभी नहीं आया
ये कौन मुझ को अधूरा बना के छोड़ गया
पलट के मेरा मुसव्विर कभी नहीं आया
मकाँ हूँ जिस में कोई भी मकीं नहीं रहता
शजर हूँ जिस पे कि ताइर कभी नहीं आया
तेरी आँखों की चमक बस और इक पल है अभी
देख ले इस चाँद को कुछ दूर बादल है अभी
आँख तो ख़ुद को नए चेहरों में खो कर रह गई
दिल मगर उस शख़्स के जाने से बोझल है अभी
अब तलक चेहरे पे हैं तूफ़ाँ गुज़रने के निशाँ
तह में पत्थर जा चुका पानी पे हलचल है अभी
तू तो उन का भी गिला करता है जो तेरे न थे
तू ने देखा ही नहीं कुछ भी तू पागल है अभी
कर गया सूरज मुझे तन्हा कहाँ ला कर 'नसीम'
क्या करूँ मैं रास्ते में शब का जंगल है अभी
अपना सारा बोझ ज़मीं पर फेंक दिया
तुझ को ख़त लिक्खा और लिख कर फेंक दिया
ख़ुद को साकिन देखा ठहरे पानी में
जाने क्या कुछ सोच के पत्थर फेंक दिया
दीवारें क्यूँ ख़ाली ख़ाली लगती हैं
किस ने सब कुछ घर से बाहर फेंक दिया
मैं तो अपना जिस्म सुखाने निकला था
बारिश ने फिर मुझ पे समुंदर फेंक दिया
वो कैसा था उस को कहाँ पर देखा था
अपनी आँखों ने हर मंज़र फेंक दिया
अपनी मजबूरी बताता रहा रो कर मुझ को
वो मिला भी तो किसी और का हो कर मुझ को
मैं ख़ुदा तो नहीं जो उस को दिखाई न दिया
ढूँढता मेरा पुजारी कभी खो कर मुझ को
पा लिया जिस ने तह-ए-आब भी अपना साहिल
मुतमइन था मिरा तूफ़ान डुबो कर मुझ को
रेग-ए-साहिल पे लिखी वक़्त की तहरीर हूँ मैं
मौज आए तो चली जाएगी धो कर मुझ को
नींद ही जैसे कोई कुंज-ए-अमाँ है अब तो
चैन मिलता है बहुत देर से सो कर मुझ को
फ़स्ल-ए-गुल हो तो निकाले मुझे इस बर्ज़ख़ से
भूल जाए न तह-ए-संग वो बो कर मुझ को
तमाम उम्र सफ़र का समर मिलेगा मुझे
पस-ए-उफ़ुक़ ही कहीं अब तो घर मिलेगा मुझे
ये किस लिए मैं ख़ला-दर-ख़ला भटकता हूँ
वो कौन है जो मिरा चाँद पर मिलेगा मुझे
मिला न जिस के लिए घर का नर्म गर्म सुकून
यहीं कहीं वो सर-ए-रहगुज़र मिलेगा मुझे
अज़ाब ये है कि तन्हा कटेगी उम्र तमाम
सफ़र के बाद कोई हम-सफ़र मिलेगा मुझे
कहीं दिखाई न दे काश छोड़ने वाला
कहूँगा क्या मैं उसे अब अगर मिलेगा मुझे
हाथ हाथों में न दे बात ही करता जाए
है बहुत लम्बा सफ़र यूँ तो न डरता जाए
जी में ठानी है कि जीना है बहर-हाल मुझे
जिस को मरना है वो चुप-चाप ही मरता जाए
ख़ुद को मज़बूत बना रक्खे पहाड़ों की तरह
रेत का आदमी अंदर से बिखरता जाए
सुर्ख़ फूलों का नहीं ज़र्द उदासी का सही
रंग कुछ तो मिरी तस्वीर में भरता जाए
मुझ से नफ़रत है अगर उस को तो इज़हार करे
कब मैं कहता हूँ मुझे प्यार ही करता जाए
घर की दीवार को इतना भी तू ऊँचा न बना
तेरा हम-साया तिरे साए से डरता जाए
उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा
आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा
जिस घड़ी आया पलट कर इक मिरा बिछड़ा हुआ
आम से कपड़ों में था वो फिर भी शहज़ादा लगा
हर घड़ी तय्यार है दिल जान देने के लिए
उस ने पूछा भी नहीं ये फिर भी आमादा लगा
कारवाँ है या सराब-ए-ज़िंदगी है क्या है ये
एक मंज़िल का निशाँ इक और ही जादा लगा
रौशनी ऐसी अजब थी रंग-भूमी की 'नसीम'
हो गए किरदार मुदग़म कृष्ण भी राधा लगा