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तेरी आँखों की चमक बस और इक पल है अभी
देख ले इस चाँद को कुछ दूर बादल है अभी
देख ले इस चाँद को कुछ दूर बादल है अभी
आँख तो ख़ुद को नए चेहरों में खो कर रह गई
दिल मगर उस शख़्स के जाने से बोझल है अभी
अब तलक चेहरे पे हैं तूफ़ाँ गुज़रने के निशाँ
तह में पत्थर जा चुका पानी पे हलचल है अभी
तू तो उन का भी गिला करता है जो तेरे न थे
तू ने देखा ही नहीं कुछ भी तू पागल है अभी
कर गया सूरज मुझे तन्हा कहाँ ला कर 'नसीम'
क्या करूँ मैं रास्ते में शब का जंगल है अभी
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न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना
गए हुए के लिए दिल में कुछ जगह रखना
गए हुए के लिए दिल में कुछ जगह रखना
हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले
ज़बाँ पे अच्छे दिनों का ही ज़ाइक़ा रखना
न हो कि क़ुर्ब ही फिर मर्ग-ए-रब्त बन जाए
वो अब मिले तो ज़रा उस से फ़ासला रखना
उतार फेंक दे ख़ुश-फ़हमियों के सारे ग़िलाफ़
जो शख़्स भूल गया उस को याद क्या रखना
अभी न इल्म हो उस को लहू की लज़्ज़त का
ये राज़ उस से बहुत देर तक छुपा रखना
कभी न लाना मसाइल घरों के दफ़्तर में
ये दोनों पहलू हमेशा जुदा जुदा रखना
उड़ा दिया है जिसे चूम कर हवा में 'नसीम'
उसे हमेशा हिफ़ाज़त में ऐ ख़ुदा रखना
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उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा
आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा
आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा
जिस घड़ी आया पलट कर इक मिरा बिछड़ा हुआ
आम से कपड़ों में था वो फिर भी शहज़ादा लगा
हर घड़ी तय्यार है दिल जान देने के लिए
उस ने पूछा भी नहीं ये फिर भी आमादा लगा
कारवाँ है या सराब-ए-ज़िंदगी है क्या है ये
एक मंज़िल का निशाँ इक और ही जादा लगा
रौशनी ऐसी अजब थी रंग-भूमी की 'नसीम'
हो गए किरदार मुदग़म कृष्ण भी राधा लगा
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