Dushyant Kumar

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    मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
    हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

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    इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
    नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

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    एक आदत सी बन गई है तू
    और आदत कभी नहीं जाती

    Dushyant Kumar
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    रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
    इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो

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    मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ
    हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

    Dushyant Kumar
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    कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
    एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

    Dushyant Kumar
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    जाने किस किस का ख़याल आया है
    इस समुंदर में उबाल आया है

    एक बच्चा था हवा का झोंका
    साफ़ पानी को खंगाल आया है

    Dushyant Kumar
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    न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
    ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

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    इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
    नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

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    हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
    रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही

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