Qamar Jalalvi

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    बाग़-ए-आलम में रहे शादी-ओ-मातम की तरह
    फूल की तरह हँसे रो दिए शबनम की तरह

    शिकवा करते हो ख़ुशी तुम से मनाई न गई
    हम से ग़म भी तो मनाया न गया ग़म की तरह

    रोज़ महफ़िल से उठाते हो तो दिल दुखता है
    अब निकलवाओ तो फिर हज़रत-ए-आदम की तरह

    लाख हम रिंद सही हज़रत-ए-वाइ'ज़ लेकिन
    आज तक हम ने न पी क़िब्ला-ए-आलम की तरह

    तेरे अंदाज़-ए-जराहत के निसार ऐ क़ातिल
    ख़ून ज़ख़्मों पे नज़र आता है मरहम की तरह

    ख़ौफ़ दिल से न गया सुब्ह के होने का 'क़मर'
    वस्ल की रात गुज़ारी है शब-ए-ग़म की तरह

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    अब तो मुँह से बोल मुझ को देख दिन भर हो गया
    ऐ बुत-ए-ख़ामोश क्या सच-मुच का पत्थर हो गया

    अब तो चुप हो बाग़ में नालों से महशर हो गया
    ये भी ऐ बुलबुल कोई सय्याद का घर हो गया

    इल्तिमास-ए-क़त्ल पर कहते हो फ़ुर्सत ही नहीं
    अब तुम्हें इतना ग़ुरूर अल्लाहु-अकबर हो गया

    महफ़िल-ए-दुश्मन में जो गुज़री वो मेरे दिल से पूछ
    हर इशारा जुम्बिश-ए-अबरू का ख़ंजर हो गया

    आशियाने का बताएँ क्या पता ख़ाना-ब-दोश
    चार तिनके रख लिए जिस शाख़ पर घर हो गया

    हिर्स तो देखो फ़लक भी मुझ पे करता है सितम
    कोई पूछे तो भी क्या उन के बराबर हो गया

    सोख़्ता दिल में न मिलता तीर को ख़ूँ ऐ 'क़मर'
    ये भी कुछ मेहमाँ की क़िस्मत से मयस्सर हो गया

    Qamar Jalalvi
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    किसी सूरत सहर नहीं होती
    रात इधर से उधर नहीं होती

    ख़ौफ़ सय्याद से न बर्क़ का डर
    बात ये अपने घर नहीं होती

    एक वो हैं कि रोज़ आते हैं
    एक हम हैं ख़बर नहीं होती

    अब मैं समझा हूँ काट कर शब-ए-ग़म
    ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती

    कितनी पाबंद-ए-वज़्अ है शब-ए-ग़म
    कभी ग़ैरों के घर नहीं होती

    कितनी सीधी है राह-ए-मुल्क-ए-अदम
    हाजत-ए-राहबर नहीं होती

    सुन लिया होगा तुम ने हाल-ए-मरीज़
    अब दवा कारगर नहीं होती

    अर्श मिलता है मेरी आहों से
    लेकिन उन को ख़बर नहीं होती

    Qamar Jalalvi
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    सुर्ख़ियाँ क्यूँ ढूँढ कर लाऊँ फ़साने के लिए
    बस तुम्हारा नाम काफ़ी है ज़माने के लिए

    मौजें साहिल से हटाती हैं हबाबों का हुजूम
    वो चले आए हैं साहिल पर नहाने के लिए

    सोचता हूँ अब कहीं बिजली गिरी तो क्यूँ गिरी
    तिनके लाया था कहाँ से आशियाने के लिए

    छोड़ कर बस्ती ये दीवाने कहाँ से आ गए
    दश्त की बैठी-बिठाई ख़ाक उड़ाने के लिए

    हँस के कहते हो ज़माना भर मुझी पर जान दे
    रह गए हो क्या तुम्हीं सारे ज़माने के लिए

    शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम
    गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए

    काएनात-ए-इश्क़ इक दिल के सिवा कुछ भी नहीं
    वो ही आने के लिए है वो ही जाने के लिए

    ऐ ज़माने भर को ख़ुशियाँ देने वाले ये बता
    क्या 'क़मर' ही रह गया है ग़म उठाने के लिए

    Qamar Jalalvi
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    राज़-ए-दिल क्यूँ न कहूँ सामने दीवानों के
    ये तो वो लोग हैं अपनों के न बेगानों के

    वो भी क्या दौर थे साक़ी तिरे मस्तानों के
    रास्ते राह तका करते थे मय-ख़ानों के

    बादलों पर ये इशारे तिरे दीवानों के
    टुकड़े पहुँचे हैं कहाँ उड़ के गरेबानों के

    रास्ते बंद किए देते हो दीवानों के
    ढेर लग जाएँगे बस्ती में गरेबानों के

    न अज़ाँ देता न हुशियार बरहमन होता
    दर तो उस शैख़ ने खुलवाए हैं बुतख़ानों के

    आप दिन-रात सँवारा करें गेसू तो क्या
    कहीं हालात बदलते हैं परेशानों के

    मनअ' कर गिर्या-ए-शबनम पे न ये फूल हँसें
    लाले पड़ जाएँगे ऐ बाद-ए-सबा जानों के

    क्या ज़माना था उधर शाम इधर हाथ में जाम
    सुब्ह तक दौर चला करते थे पैमानों के

    वो भी क्या दिन थे उधर शाम इधर हाथ में जाम
    अब तो रस्ते भी रहे याद न मय-ख़ानों के

    आज तक तो मिरी कश्ती ने न पाई मंज़िल
    क़ाफ़िले सैंकड़ों गुम हो गए तूफ़ानों के

    ख़ाक-ए-सहरा पे लकीरें हैं उन्हें फिर देखो
    कहीं ये ख़त न हों लिक्खे हुए दीवानों के

    देखिए चर्ख़ पे तारे भी हैं क्या बे-तरतीब
    जैसे बिखरे हुए टुकड़े मिरे पैमानों के

    हाथ ख़ाली हैं मगर मुल्क-ए-अदम का है सफ़र
    हौसले देखिए उन बे-सर-ओ-सामानों के

    सर झुकाए हुए बैठे हैं जो का'बे में 'क़मर'
    ऐसे होते हैं निकाले हुए बुतख़ानों के

    Qamar Jalalvi
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    हुस्न कब इश्क़ का ममनून-ए-वफ़ा होता है
    लाख परवाना मरे शम्अ पे क्या होता है

    शग़्ल-ए-सय्याद यही सुब्ह ओ मसा होता है
    क़ैद होता है कोई कोई रिहा होता है

    जब पता चलता है ख़ुशबू की वफ़ादारी का
    फूल जिस वक़्त गुलिस्ताँ से जुदा होता है

    ज़ब्त करता हूँ तो घुटता है क़फ़स में मिरा दम
    आह करता हूँ तो सय्याद ख़फ़ा होता है

    ख़ून होता है सहर तक मिरे अरमानों का
    शाम-ए-वादा जो वो पाबंद-ए-हिना होता है

    चाँदनी देख के याद आते हैं क्या क्या वो मुझे
    चाँद जब शब को 'क़मर' जल्वा-नुमा होता है

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    मिरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देना
    ज़बाँ से कुछ न कहना देख कर आँसू बहा देना

    नशेमन हो न हो ये तो फ़लक का मश्ग़ला ठहरा
    कि दो तिनके जहाँ पर देखना बिजली गिरा देना

    मैं इस हालत से पहुँचा हश्र वाले ख़ुद पुकार उठ्ठे
    कोई फ़रियाद वाला आ रहा है रास्ता देना

    इजाज़त हो तो कह दूँ क़िस्सा-ए-उल्फ़त सर-ए-महफ़िल
    मुझे कुछ तो फ़साना याद है कुछ तुम सुना देना

    मैं मुजरिम हूँ मुझे इक़रार है जुर्म-ए-मोहब्बत का
    मगर पहले तो ख़त पर ग़ौर कर लो फिर सज़ा देना

    हटा कर रुख़ से गेसू सुब्ह कर देना तो मुमकिन है
    मगर सरकार के बस में नहीं तारे छुपा देना

    ये तहज़ीब-ए-चमन बदली है बैरूनी हवाओं ने
    गरेबाँ-चाक फूलों पर कली का मुस्कुरा देना

    'क़मर' वो सब से छुप कर आ रहे हैं फ़ातिहा पढ़ने
    कहूँ किस से कि मेरी शम-ए-तुर्बत को बुझा देना

    Qamar Jalalvi
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    कभी कहा न किसी से तिरे फ़साने को
    न जाने कैसे ख़बर हो गई ज़माने को

    दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल खिले
    कहीं जगह न रही मेरे आशियाने को

    मिरी लहद पे पतंगों का ख़ून होता है
    हुज़ूर शम्अ' न लाया करें जलाने को

    सुना है ग़ैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
    कहो तो आज सजा लूँ ग़रीब-ख़ाने को

    दबा के क़ब्र में सब चल दिए दुआ न सलाम
    ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को

    अब आगे इस में तुम्हारा भी नाम आएगा
    जो हुक्म हो तो यहीं छोड़ दूँ फ़साने को

    'क़मर' ज़रा भी नहीं तुम को ख़ौफ़-ए-रुस्वाई
    चले हो चाँदनी शब में उन्हें बुलाने को

    Qamar Jalalvi
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    ज़ब्त करता हूँ तो घुटता है क़फ़स में मिरा दम
    आह करता हूँ तो सय्याद ख़फ़ा होता है

    Qamar Jalalvi
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    ज़रा रूठ जाने पे इतनी ख़ुशामद
    'क़मर' तुम बिगाड़ोगे आदत किसी की

    Qamar Jalalvi
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