सिफ़ारिश की ज़रूरत ही न होती
नवाज़िश की ज़रूरत ही न होती
अगर आता हमें हक़ छीन लेना
गुज़ारिश की ज़रूरत ही न होती
अगर सूखे कुएँ शबनम से भरते
तो बारिश की ज़रूरत ही न होती
नहीं आते अगर दुनिया में हम तो
रिहाइश की ज़रूरत ही न होती
हसीनों का जो होता हुस्न सादा
नुमाइश की ज़रूरत ही न होती
अगर होता न शौक़-ए-ख़ुद-सनाई
सताइश की ज़रूरत ही न होती
सियासत-दाँ जो तब्ई मौत मरते
तो साज़िश की ज़रूरत ही न होती
अगर तुम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' करते क़नाअ'त
तो ख़्वाहिश की ज़रूरत ही न होती
— Ghaus Khah makhah Hyderabadi















