हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं
मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं
रक़ीब आकर बताते हैं यहाँ तिल है वहाँ तिल है
हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले बहुत पहले
ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे
बहुत से ज़र्द चेहरों पर ग़ुबार-ए-ग़म है कम बे-शक पर उन को मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे
मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता
पहले ख़याल रख मिरा मेहमान कर मुझे
फिर अपनी कोई चाल से हैरान कर मुझे
हैं कौन आप, याद नहीं,कब मिले थे हम
इतना भी ख़ुश न होइए पहचान कर मुझे
दुश्मनी कर मगर उसूल के साथ
मुझ पर इतनी सी मेहरबानी हो
मेरे मे'यार का तक़ाज़ा है
मेरा दुश्मन भी ख़ानदानी हो
तेरा बनता था कि तू दुश्मन हो
अपने हाथों से खिलाया था तुझे
तेरी गाली से मुझे याद आया
कितने तानों से बचाया था तुझे
मुझ से नफ़रत है अगर उस को तो इज़हार करे
कब मैं कहता हूँ मुझे प्यार ही करता जाए
इज़हार-ए-इश्क़ उस से न करना था 'शेफ़्ता'
ये क्या किया कि दोस्त को दुश्मन बना दिया