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फ़ुज़ूल नाज़ उठाने से बात बिगड़ी है
किसी को दिल में बसाने से बात बिगड़ी है
किसी को दिल में बसाने से बात बिगड़ी है
था वाजिबी सा तअल्लुक़ तो बात अच्छी थी
तअ'ल्लुक़ात बढ़ाने से बात बिगड़ी है
हम इख़्तिलाफ़ को आपस में तय न कर पाए
किसी को बीच बुलाने से बात बिगड़ी है
मोहब्बतों में तकल्लुफ़ भी है सम-ए-क़ातिल
क़दम सँभल के उठाने से बात बिगड़ी है
तुम्हारे साथ बिगड़ने पे कुछ मलाल नहीं
हमारी एक ज़माने से बात बिगड़ी है
फ़ज़ा-ए-वहम दर आई तअ'ल्लुक़ात के बीच
घड़ी घड़ी के फ़साने से बात बिगड़ी है
हम अपनी ज़ात की तरदीद कर नहीं पाए
अना के ज़ो'म में आने से बात बिगड़ी है
तिरे बग़ैर गुज़ारा नहीं किसी सूरत
उसे ये बात बताने से बात बिगड़ी है
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अन-देखी और भोली-भाली दुनिया है
उस खिड़की के पार अनोखी दुनिया है
उस खिड़की के पार अनोखी दुनिया है
आप का इस्तेहक़ाक़ था राह बदल लेना
सब का अपना जीवन अपनी दुनिया है
चाँद सितारे जुगनू फूल किताबें ख़्वाब
इक लड़की की कितनी प्यारी दुनिया है
दिल की बात बता कर मुजरिम बन बैठे
इस्तिग़फ़ार ख़ुदाया कैसी दुनिया है
इश्क़-नगर में कोई पहला पीर नहीं
ख़ैर से अपनी देखी भाली दुनिया है
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गुज़िश्ता शब जो इतनी रौशनी थी
तुम्हारी याद की जल्वागरी थी
तुम्हारी याद की जल्वागरी थी
फ़ज़ा में गुनगुनाहट थी अजब सी
हवा पत्तों से बातें कर रही थी
ग़ज़ल जैसा सरापा था किसी का
कोई सूरत मुकम्मल शाइ'री थी
तिरे अल्फ़ाज़ निश्तर बन गए थे
मोहब्बत इंतिहा पर आ गई थी
सुना है बा'द मेरे कुछ दिनों तक
वो मिट्टी पर लकीरें खींचती थी
वो गाहे अब पलट कर देखती है
कोई इक बात कहना रह गई थी
वही हम हैं वही तीरा-शबी है
मोहब्बत चार दिन की चाँदनी थी
लबों पर क़हक़हे ही क़हक़हे थे
कोई लड़की थी या वो फुलजड़ी थी
कोई दिल में अचानक आ बसा था
मोहब्बत की नहीं थी हो गई थी
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