मुनाफ़िक़ीन से अज़लाम से मुक़ाबला है
मदीने वाले हैं और शाम से मुक़ाबला है
ख़ुदा के आख़िरी पैग़ाम से मुक़ाबला है
जनाब-ए-शैख़ का इस्लाम से मुक़ाबला है
हमारे शे'र का आवर्द से तक़ाबुल छोड़
हमारे शे'र का इल्हाम से मुक़ाबला है
वो पास बैठा है और वसवसे जुदाई के
मिरे यक़ीन का औहाम से मुक़ाबला है
बदन कमान हुआ और साँस घुटने लगी
हमारा गर्दिश-ए-अय्याम से मुक़ाबला है
— Iftikhar Haidar















