दोनों आँखों में भर लिया जाए
हुस्न महफ़ूज़ कर लिया जाए
ज़िंदगी से कलाम करने को
इज़्न-ए-नूर-ए-सहर लिया जाए
हम से पादाश में मोहब्बत की
जान ली जाए सर लिया जाए
बे-ख़ता है तो फिर भी डर ऐ दोस्त
बे-ख़ता ही न धर लिया जाए
शहर-ए-उम्मीद कितना दिलकश है
आओ कुछ दिन ठहर लिया जाए
कैसा सरसब्ज़ है तुम्हारा साथ
इस को तस्वीर कर लिया जाए
— Iftikhar Haidar















