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सियाह रात के बदन पे दाग़ बन के रह गए
हम आफ़्ताब थे मगर चराग़ बन के रह गए
हम आफ़्ताब थे मगर चराग़ बन के रह गए
किसी को इश्क़ में भी अब जुनूँ से वास्ता नहीं
ये क्या हुआ कि सारे दिल दिमाग़ बन के रह गए
वो शाख़ शाख़ नीले पीले लाल रंग क्या हुए
तमाम दश्त के परिंद ज़ाग़ बन के रह गए
जिन्हें ये ज़ो'म था ज़मीं से तिश्नगी मिटाएँगे
अजब हुआ वही तही-अयाग़ बन के रह गए
मिलेगा सब को अपना हक़ रहेंगे सब सुकून से
मगर वो सारे वा'दे सब्ज़ बाग़ बन के रह गए
उजाड़ते हैं रोज़ हम बसी-बसाई बस्तियाँ
ख़ुशा वो लोग जो मकीन-ए-राग़ बन के रह गए
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तह-ब-तह है राज़ कोई आब की तहवील में
ख़ामुशी यूँ ही नहीं रहती है गहरी झील में
ख़ामुशी यूँ ही नहीं रहती है गहरी झील में
मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई
आज तक मसरूफ़ हूँ उस ख़्वाब की तकमील में
हर घड़ी अहकाम जारी करता रहता है ये दिल
हाथ बाँधे मैं खड़ा हूँ हुक्म की तामील में
कब मिरी मर्ज़ी से कोई काम होता है तमाम
हर घड़ी रहता हूँ मैं क्यूँ बे-सबब ताजील में
माँगती है अब मोहब्बत अपने होने का सुबूत
और मैं जाता नहीं इज़हार की तफ़्सील में
मुद्दआ' तेरा समझ लेता हूँ तेरी चाल से
तू परेशाँ है अबस अल्फ़ाज़ की तावील में
अपनी ख़ातिर भी तो 'आलम' चीज़ रखनी थी कोई
अब कहाँ कुछ भी बचा है तेरी इस ज़म्बील में
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एक अजब सी दुनिया देखा करता था
दिन में भी मैं सपना देखा करता था
दिन में भी मैं सपना देखा करता था
एक ख़याल-आबाद था मेरे दिल में भी
ख़ुद को मैं शहज़ादा देखा करता था
सब्ज़ परी का उड़न-खटोला हर लम्हे
अपनी जानिब आता देखा करता था
उड़ जाता था रूप बदल कर चिड़ियों के
जंगल सहरा दरिया देखा करता था
हीरे जैसा लगता था इक इक पत्थर
हर मिट्टी में सोना देखा करता था
कोई नहीं था तिश्ना रेगिस्तानों में
हर सहरा में दरिया देखा करता था
हर जानिब हरियाली थी ख़ुश-हाली थी
हर चेहरे को हँसता देखा करता था
बचपन के दिन कितने अच्छे होते हैं
सब कुछ ही मैं अच्छा देखा करता था
आँख खुली तो सारे मंज़र ग़ाएब हैं
बंद आँखों से क्या क्या देखा करता था
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हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता
जिसे पाया नहीं जाता उसे खोया नहीं जाता
जिसे पाया नहीं जाता उसे खोया नहीं जाता
कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जिन को सभी शादाब लगते हैं
कुछ ऐसे दाग़ हैं जिन को कभी धोया नहीं जाता
अजब सी गूँज उठती दर-ओ-दीवार से हर-दम
ये ख़्वाबों का ख़राबा है यहाँ सोया नहीं जाता
बहुत हँसने की आदत का यही अंजाम होता है
कि हम रोना भी चाहें तो कभी रोया नहीं जाता
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