हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं

भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं

पीछे छूटे साथी मुझ को याद आ जाते हैं
वर्ना दौड़ में सब से आगे हो सकता हूँ मैं

कब समझेंगे जिन की ख़ातिर फूल बिछाता हूँ
राह-गुज़र में काँटे भी तो बो सकता हूँ मैं

इक छोटा सा बच्चा मुझ में अब तक ज़िंदा है
छोटी छोटी बात पे अब भी रो सकता हूँ मैं

सन्नाटे में दहशत हर पल गूँजा करती है
इस जंगल में चैन से कैसे सो सकता हूँ मैं

सोच समझ कर चट्टानों से उलझा हूँ वर्ना
बहती गंगा में हाथों को धो सकता हूँ मैं

— Alam Khursheed

More by Alam Khursheed

Other ghazal from the same pen

See all from Alam Khursheed →

Yaad Shayari

Shers of yaad.

All Yaad Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling