दिलों की बातें दिलों के अंदर ज़रा सी ज़िद से दबी हुई हैं
    वो सुनना चाहें, ज़ुबां से सब कुछ मैं करना चाहूं नज़र से बतियां

    ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है
    सुलगती सांसें, तरसती आंखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियां

    Aalok Shrivastav
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    मुझे मालूम है माँ की दुआएँ साथ चलती हैं
    सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है

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    ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है
    नदी का साथ देता हूँ समंदर रूठ जाता है

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    घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी
    सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी

    तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था
    अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी

    अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है
    अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी

    भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता
    अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी

    कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन
    मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

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    तुम सोच रहे हो बस, बादल की उड़ानों तक
    मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक

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    तुम्हारे पास आते हैं तो साँसें भीग जाती हैं
    मोहब्बत इतनी मिलती है कि आँखें भीग जाती हैं

    तबस्सुम इत्र जैसा है हँसी बरसात जैसी है
    वो जब भी बात करती है तो बातें भीग जाती हैं

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    धड़कते साँस लेते रुकते चलते मैं ने देखा है
    कोई तो है जिसे अपने में पलते मैं ने देखा है

    तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन है
    तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैं ने देखा है

    न जाने कौन है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है
    ख़ुद अपने-आप को नींदों में चलते मैं ने देखा है

    मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें
    तिरे सीने में अपना दिल मचलते मैं ने देखा है

    बदल जाएगा सब कुछ बादलों से धूप चटख़ेगी
    बुझी आँखों में कोई ख़्वाब जलते मैं ने देखा है

    मुझे मालूम है उन की दुआएँ साथ चलती हैं
    सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैं ने देखा है

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    वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है
    अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता है

    मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है
    तिरे अपनों को गाँव में तो अक्सर याद आता है

    जो अपने पास हों उन की कोई क़ीमत नहीं होती
    हमारे भाई को ही लो बिछड़ कर याद आता है

    सफलता के सफ़र में तो कहाँ फ़ुर्सत कि कुछ सोचें
    मगर जब चोट लगती है मुक़द्दर याद आता है

    मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है
    नवम्बर याद आता है दिसम्बर याद आता है

    Aalok Shrivastav
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    ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं
    मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बे-ख़बर नहीं

    अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया
    मैं आप का रहूँगा मगर उम्र भर नहीं

    आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएँगे कहाँ
    आँखों से आगे उन की कोई रहगुज़र नहीं

    कितना जिएँ कहाँ से जिएँ और किस लिए
    ये इख़्तियार हम पे है तक़दीर पर नहीं

    माज़ी की राख उलटीं तो चिंगारियाँ मिलीं
    बे-शक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं

    Aalok Shrivastav
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    मंज़िलें क्या हैं, रास्ता क्या है
    हौसला हो तो फ़ासला क्या है

    Aalok Shrivastav
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