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ऐ शौक़-ए-दिल भी एक मुअम्मा अजीब है
सहरा को आँधियों की तमन्ना अजीब है
सहरा को आँधियों की तमन्ना अजीब है
मौजों के इज़्तिराब ने धड़का दिया था दिल
उतरे जो हम उतर गया दरिया अजीब है
दुश्वार हो गई है अब अपनी शनाख़्त भी
आईना कह रहा है कि चेहरा अजीब है
शाख़ें जो मेरे सहन में हैं उन में फल न आए
हम साए का दरख़्त भी कितना अजीब है
उठती है इक फ़सील तो गिरती है इक फ़सील
'फ़ाख़िर' ये चाहतों का घरौंदा अजीब है
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अब चाँद नहीं कोई सितारा नहीं कोई
शब इतनी अँधेरी है कि निकला नहीं कोई
शब इतनी अँधेरी है कि निकला नहीं कोई
हर-चंद नज़र आती है दीवार-ए-तमन्ना
चाहें कि ठहर जाएँ तो साया नहीं कोई
चेहरों को ये ग़म है कोई आईना नहीं है
आईना तरसता है कि चेहरा नहीं कोई
जिस से भी मिलो देख के रह जाता है मुँह को
ऐसा भी नहीं है कि शनासा नहीं कोई
अरमान तुम्हें फ़स्ल-ए-गुलिस्ताँ का है 'फ़ाख़िर'
शाख़ों पे यहाँ फूल तो खिलता नहीं कोई
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सीने में दिल जो दर्द का मारा नहीं मिला
फिर आइने में अक्स हमारा नहीं मिला
फिर आइने में अक्स हमारा नहीं मिला
मेले में आ गए थे कि शायद कोई मिले
इस भीड़ में भी कोई हमारा नहीं मिला
हर-चंद इक हुजूम था आँखों का हर तरफ़
लेकिन किसी नज़र का सहारा नहीं मिला
कश्ती तो डूबने के लिए बे-क़रार थी
कश्ती को डूबने का इशारा नहीं मिला
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