क्या कहीं क्या ये जहान-ए-गुज़राँ लगता है
गुल का हँसना भी तबीअ'त पे गराँ लगता है
इस जहाँ से भी तो इक रोज़ निकलना होगा
ये जहाँ भी तो किराए का मकाँ लगता है
अश्क-ए-ग़म आँख में आ जाते हैं रोकें कैसे
आग जलती है तो आँखों में धुआँ लगता है
जाने क्या मेरी समाअ'त को हुआ है 'फ़ाख़िर'
नग़्मा-ए-ऐश भी सुनिए तो फ़ुग़ाँ लगता है
— Ahmad Fakhir















