कम-निगाही भी है ख़ामोशी भी रूपोशी भी
कितनी मा'सूम है एहसान-फ़रामोशी भी
हम-सफ़र तू जो नहीं है तो ये धड़का है हमें
थक न जाए कहीं रस्ते में वफ़ा-कोशी भी
अब तू ही रखना मिरे पैराहन-ए-ग़म का ख़याल
होश की तरह से रुस्वा न हो बे-होशी भी
घर में रहिए तो सिवा होती है वहशत 'फ़ाख़िर'
चीख़ने लगती है तन्हाई में ख़ामोशी भी
— Ahmad Fakhir















