जिस शख़्स को देखो वही सरगर्म-ए-सफ़र है
दुनिया कहीं वीरान न हो जाए ये डर है
लाएगी कभी रंग हवाओं की मोहब्बत
हम जिस में बसर करते हैं वो रेत का घर है
सहरा में किसी साए की उम्मीद न टूटी
हसरत की निगाहों में बगूला भी शजर है
निकली है गुमानों से यही शक्ल यक़ीं की
जिस सम्त उड़े गर्द वही राह-गुज़र है
महताब तो निकला ही नहीं डूब के 'फ़ाख़िर'
लेकिन मिरे दरिया में वही मद्द-ओ-जज़र है
— Ahmad Fakhir















