Javed Akhtar

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    क्यों डरें ज़िन्दगी में क्या होगा
    कुछ न होगा तो तजरबा होगा

    Javed Akhtar
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    तमन्ना फिर मचल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ
    ये मौसम भी बदल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

    मुझे ग़म है कि मैं ने ज़िंदगी में कुछ नहीं पाया
    ये ग़म दिल से निकल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

    ये दुनिया-भर के झगड़े घर के क़िस्से काम की बातें
    बला हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

    नहीं मिलते हो मुझ से तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे
    ज़माना मुझ से जल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

    Javed Akhtar
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    जो बात कहते डरते हैं सब तू वो बात लिख
    इतनी अँधेरी थी न कभी पहले रात लिख

    जिनसे क़सीदे लिखे थे वो फेंक दे क़लम
    फिर ख़ून-ए-दिल से सच्चे क़लम की सिफ़ात लिख

    जो रोज़नामों में कहीं पाती नहीं जगह
    जो रोज़ हर जगह की है वो वारदात लिख

    जितने भी तंग दाएरे हैं सारे तोड़ दे
    अब आ खुली फ़िज़ाओं में अब काएनात लिख

    जो वाक़ियात हो गए उनका तो ज़िक्र है
    लेकिन जो होने चाहिए वो वाक़ियात लिख

    इस बाग़ में जो देखनी है तुझको फिर बहार
    तू डाल-डाल से सदा तू पात-पात लिख

    Javed Akhtar
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    क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा
    कुछ न होगा तो तजरबा होगा

    हँसती आँखों में झाँक कर देखो
    कोई आँसू कहीं छुपा होगा

    इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं
    शायद उसने भी ये सुना होगा

    देखकर तुमको सोचता हूँ मैं
    क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

    Javed Akhtar
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    मैं ख़ुद भी सोचता हूं ये क्या मेरा हाल है
    जिस का जवाब चाहिए वो क्या सवाल है

    घर से चला तो दिल के सिवा पास कुछ न था
    क्या मुझ से खो गया है मुझे क्या मलाल है

    आसूदगी से दल के सभी दाग़ धुल गए
    लेकिन वो कैसे जाए जो शीशे में बाल है

    बे-दस्त-ओ-पा हूं आज तो इल्ज़ाम किस को दूं
    कल मैं ने ही बुना था ये मेरा ही जाल है

    फिर कोई ख़्वाब देखूं कोई आरज़ू करूं
    अब ऐ दिल-ए-तबाह तिरा क्या ख़याल है

    Javed Akhtar
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    वो ज़माना गुज़र गया कब का
    था जो दीवाना मर गया कब का

    ढूँढता था जो इक नई दुनिया
    लौट के अपने घर गया कब का

    वो जो लाया था हम को दरिया तक
    पार अकेले उतर गया कब का

    उस का जो हाल है वही जाने
    अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का

    ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
    अब कहाँ है बिखर गया कब का

    Javed Akhtar
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    कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझ को तेरी तलाश क्यूँ है
    कि जब हैं सारे ही तार टूटे तो साज़ में इर्तिआश क्यूँ है

    कोई अगर पूछता ये हम से बताते हम गर तो क्या बताते
    भला हो सब का कि ये न पूछा कि दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है

    उठा के हाथों से तुम ने छोड़ा चलो न दानिस्ता तुम ने तोड़ा
    अब उल्टा हम से तो ये न पूछो कि शीशा ये पाश पाश क्यूँ है

    अजब दो-राहे पे ज़िंदगी है कभी हवस दिल को खींचती है
    कभी ये शर्मिंदगी है दिल में कि इतनी फ़िक्र-ए-मआ'श क्यूँ है

    न फ़िक्र कोई न जुस्तुजू है न ख़्वाब कोई न आरज़ू है
    ये शख़्स तो कब का मर चुका है तो बे-कफ़न फिर ये लाश क्यूँ है

    Javed Akhtar
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    जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
    लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो

    फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है
    किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो

    ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने
    क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो

    इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँ है
    तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो

    तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
    निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो

    ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
    कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो

    Javed Akhtar
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    जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
    मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

    ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
    बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता

    मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
    किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

    बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
    ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता

    ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो
    कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता

    Javed Akhtar
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    सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है
    हर घर में बस एक ही कमरा कम है

    Javed Akhtar
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