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ज़रा ठहरो सुनाने को हसीं नग़्मात बाक़ी हैं
बयाँ करने को इस दिल के कई जज़्बात बाक़ी हैं
बयाँ करने को इस दिल के कई जज़्बात बाक़ी हैं
अभी से चल दिए सुन कर अधूरी दास्ताँ लोगों
अभी खुलने हमारे क़ीमती सफ़्हात बाक़ी हैं
अदब, तहज़ीब सब कुछ भूल बैठी हैं नई नस्लें
न जाने देखने को और क्या हालात बाक़ी हैं
ज़रा-सी बूँद से गिरने लगा है ये मकाँ मेरा
अभी सावन के मौसम की कई बरसात बाक़ी हैं
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आईना हमें ख़ुद का जब चेहरा दिखाता है
हर बार हमें ख़ुद की नज़रों में गिराता है
हर बार हमें ख़ुद की नज़रों में गिराता है
मुँह फेर के निकले थे क्या सोच के जाएँ अब
किस मुँह से कहे आख़िर, घर याद वो आता है
हम छोड़ वतन अपना परदेस में बैठे हैं
हर रोज़ वतन हम को आवाज़ लगाता है
ख़ामोश ज़बाँ मेरी तब शोर मचाती है
जब दोस्त नज़र कोई इस शहर में आता है
दिल भूल जा वो बातें, बातें जो पुरानी हैं
क्यूँ अश्क-ए-नदामत से आँखों को भिगाता है
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