हुए हैं जब से ग़ाएब ख़्वाब आँखों से
नज़र आता हूँ मैं बे-ताब आँखों से
डरा सकता नहीं तूफ़ाँ हमें कोई
के देखे हैं कई सैलाब आँखों से
ख़िज़ाँ ने जो उजाड़ा है चमन मेरा
ख़ुदा कर दे उसे शादाब आँखों से
रुके अश्कों का इक तालाब है मुझ में
निकल जाए वही तालाब आँखों से
बताते हैं यही ता'रीफ़ में उस की
हमारा यार है नायाब आँखों से
तेरे हाथों पिए पानी से भी साक़ी
नज़र आए कई महताब आँखों से
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















