"मज़हबी जंग"
उधर मज़हबी जंग का शोर है
ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है
तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर
है टूटी इमारत दुकानें सभी
है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर
कहीं चीख़ ने की सदा है
कहीं ख़ामुशी का है आलम
कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई
हैं तलवार हाथों में पकड़े कई
सितमगर बढ़ाते बग़ावत
न दैर-ओ-हरम है सलामत
ज़मीं पर है उतरी क़यामत
है बिगड़े से हालात अब शहर में
हुई हैं मियाँ
कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में
फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की
समुंदर लबा-लब है लाशों से ही
न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है
ये उठता धुआँ और जलता मकाँ
बताते हैं नफ़रत का ये दौर है















