बारिश में अक्सर नाव काग़ज़ की बनाते थे मियाँ
इन मौसमों का लुत्फ़ पहले यूँॅं उठाते थे मियाँ
अब खिड़कियों से धूप आती है तो आँखें खुलती हैं
पहले उजाले से भी जल्दी जाग जाते थे मियाँ
है मुँह-ज़बानी याद गुज़रे दौर के क़िस्से हमें
कैसे कमाते थे कि कैसे घर चलाते थे मियाँ
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















