किस तरह ज़ाहिर करें हम चीज़ क्या है ज़िंदगी
एक पल की दास्ताँ फिर हादिसा है ज़िंदगी
आप आँखों से मेरी आँखें मिला कर देखिए
ख़ूबसूरत-सी मगर ज़ालिम बला है ज़िंदगी
कब किसे बख़्शे इनायत कब किसे बख़्शे सितम
मेहरबाँ है कुछ पे तो कुछ से ख़फ़ा है ज़िंदगी
इस तरह होती फ़ना मिलता नहीं नक़्श-ए-वुजूद
हू-ब-हू पानी का कोई बुलबुला है ज़िंदगी
— MAHESH CHAUHAN NARNAULI















