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मुहब्बत में मुझे भी अब पता ये चल गया यारों
कि मिल कर के बिछड़ना इश्क़ का दस्तूर होता है
कि मिल कर के बिछड़ना इश्क़ का दस्तूर होता है
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मैं बेक़रार बहुत था उन्हीं से मिलने को
जब आए पास मेरे वो तो फिर ख़ुशी आई
हमें तो हँसते हुए भी निकल पड़े आँसू
कभी-कभी तो रुलाई में भी हँसी आई
भले न बात रही वो जो बात पहले थी
दुआ सलाम में फिर भी नहीं कमी आई
दिलों की बात जो नग़्मों में कर रहे ‘रोहित’
ख़याल-ए-यार में शायद सुख़नवरी आई
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