आ गया इश्क़ का घटाना बस
अब नहीं कुछ भी आज़माना बस
अब नहीं कुछ भी आज़माना बस
तुम नहीं आए मेरी ग़लती है
हम को आता नहीं बुलाना बस
तुम ने जो बोला हम ने मान लिया
वो हक़ीक़त हो या फ़साना बस
तुम ने भी हाँ यही तो सीखा है
अच्छे रिश्तों को काट खाना बस
सिर्फ़ अच्छे दिनों के साथी हो
तुम ख़ुशी और ये ज़माना बस
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वैसे तो लोग आते जाते हैं
पर तिरे जैसे दिल को भाते हैं
पर तिरे जैसे दिल को भाते हैं
हम ग़ज़ल फिर कभी बना लेंगे
चल तेरा बर्थडे मनाते हैं
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सुनो ख़ाली मकानों में मेरा भी मन नहीं लगता
हक़ीक़त में फ़सानों में मेरा भी मन नहीं लगता
हक़ीक़त में फ़सानों में मेरा भी मन नहीं लगता
तुम्हें यूँॅं भूल जाने में बहुत मुश्किल तो आएगी
मगर आसान कामों में मेरा भी मन नहीं लगता
ज़मीं से इश्क़ था सो हम फ़लक छू कर के लौट आए
तेरे बिन आसमानों में मेरा भी मन नहीं लगता
मैं अपने गाॅंव की मिट्टी की ख़ुशबू का दिवाना हूँ
नगर के कारखानों में मिरा भी मन नहीं लगता
अगर मन हो तो सुन लेता हूँ मैं तहज़ीब की गजलें
कभी लेटेस्ट गानों में मेरा भी मन नहीं लगता
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