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ख़ामुशी की मार हैं हम
दर-ब-दर बेज़ार हैं हम
दर-ब-दर बेज़ार हैं हम
थाम लो बाहों में अपनी
थोड़े से बीमार हैं हम
तू ही अपना है हमारा
तेरे पहरेदार हैं हम
है ख़ुदा माना तुझे फिर
ग़म से क्यूँ दो चार हैं हम
है तू बाक़ी हम में अब भी
कश्ती तू पतवार हैं हम
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दिल दुखा कर भी ठहरा हुआ है
किस क़दर इश्क़ गहरा हुआ है
किस क़दर इश्क़ गहरा हुआ है
मुझ से मत पूछो अब हाल मेरा
ये समुंदर भी सहरा हुआ है
सच कहूँ पास कुछ भी नहीं पर
दर्द कब से ये ठहरा हुआ है
मैं निकल आया उस दर से भी अब
जब से खिड़की पे पहरा हुआ है
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