मिलती जुलती वो सूरत नज़र आती है
हर किसी की ज़रूरत नज़र आती है
रुक सी जाती हैं नज़रें उसी पे ही बस
सादगी की वो मूरत नज़र आती है
कैसे रोकूॅं मैं ख़ुद को फ़ना होने से
ये मोहब्बत कुदूरत नज़र आती है
पास मेरे नहीं कुछ सिवा मेरे अब
उस की अब फिर ज़रूरत नज़र आती है
— Ankur Mishra















