इक ज़माना है जो बेकार समझता है मुझे
और इक तू जो तेरा यार समझता है मुझे
है ये लाज़िम कि तू भोला है तो भोला समझे
वरना हर शख़्स तो हुशियार समझता है मुझे
एक मैं हूँ कि वफ़ा लफ़्ज़ से वाक़िफ़ नहीं हूँ
एक तू है कि वफ़ादार समझता है मुझे
जाने कितनों की हूँ ख़्वाहिश जिन्हें हासिल नहीं मैं
जिस को हासिल हूँ वो इतवार समझता है मुझे
— Adesh Rathore















