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कहता, चला जाता है क्या क्या इश्क़ में
क्या क्या का मतलब क्या है? क्या क्या जाएगा?
क्या क्या का मतलब क्या है? क्या क्या जाएगा?
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मैं तेरे शहर में जलते दिए लाया नहीं होता
जो याद आता कि तारीकी का वाँ पहरा नहीं होता
जो याद आता कि तारीकी का वाँ पहरा नहीं होता
सलीक़े से छुपाती है वो औरत ज़ख़्म चेहरे के
सभी घूँघट का मक़्सद ग़ैर से पर्दा नहीं होता
जिसे मन्नत में माँगा था वही बेटा रुलाता है
सभी माँ के लिए फल सब्र का मीठा नहीं होता
नहीं होता भरोसा मुझ को लँगड़े इश्क़ पर जिस
में
दिवाना वस्ल होता है मगर ग़ुस्सा नहीं होता
यही सब लोग चाहेंगे तुम्हारा काम रुक जाए
कहेंगे होने पर "मेहनत से आख़िर क्या नहीं होता
मैं इतना बोल पाया था "सुनो बच्चों ख़ुदा सबका..."
यतीमों से उठा हल्ला "नहीं होता नहीं होता"
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एक मैं भी रहूँ इक जहाँ भी रहे
शंख गूँजे सदा और अज़ाँ भी रहे
शंख गूँजे सदा और अज़ाँ भी रहे
इक दुआ में ही माँगी है दो और दुआ
बाप राशन ख़रीदे तो माँ भी रहे
क़ब्र में क़हक़हे हैं उसी की सनद
बोली थी "ख़ुश रहे तू जहाँ भी रहे
दिल भी जलकर बने हुस्न-ए-रंज-ओ-करम
रौशनी भी रहे और धुआँ भी रहे
पानी पी कर ही डूबेंगे मग़रूर सब
सो नदी के किनारे कुआँ भी रहे
सर पटक के अगर मुस्कुराऊँ भी मैं
चाहता हूँ जबीं पर निशाँ भी रहे
सिर्फ़ भँवरे नहीं हैं रुकावट यहाँ
फूल तोड़ो तो काँटो का ध्याँ भी रहे
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आए थे ग़मगुसार भी मुस्कान बाँटने
ग़म माँगने लगे मेरा ग़म-ख़्वार देख कर
ग़म माँगने लगे मेरा ग़म-ख़्वार देख कर
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