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वक़्त के दुख में मिरी आँखों से छलके आँसू
हो गए अश्क मिरे ऐसे अजल के आँसू
हो गए अश्क मिरे ऐसे अजल के आँसू
इतना ग़म था कि मिरी ओर से रोया अंबर
हो गए अब्र तिरे हिज्र में जल के आँसू
वो कोई लाल सियाही नहीं है ख़त में सनम
अबकी आँखों से गिरे रंग बदल के आँसू
हर घड़ी सफ़्हे के आरिज़ पे नमी रहती है
यूँ तिरी याद में गिरते हैं ग़ज़ल के आँसू
दिल ने फिर मारा तमाचा मिरी मजबूरी को
फिर तिरा ज़िक्र चला आँख से छलके आँसू
फिर ख़याल आया है तुम से है बिछड़ना इक दिन
फिर चले आए हैं आँखों में टहल के आँसू
अब की बारिश में कोई तुझ से भी तन्हा था शम्स
रोके रुकते नहीं थे अब की फ़सल के आँसू
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इक वो हम से जो बिछड़ कर कभी तन्हा न लगे
और इक हम के कभी फिर से शगुफ़्ता न लगे
और इक हम के कभी फिर से शगुफ़्ता न लगे
आह उस शब की सहर जिस
में बिछड़ना था हमें
हम तिरे साथ कभी पहले यूँ तन्हा न लगे
सिर्फ़ उसे बे-वफ़ा लिख दूँ ये ख़याल आया था
फिर ये सोचा कहीं इस दिल को ही अच्छा न लगे
इतना ख़ुश भी नहीं ये दिल के भुला दे तुझ को
पर यूँ ग़म में भी नहीं है कि दोबारा न लगे
उफ़ के इस नूर भरे चेहरे पे काजल तौबा
चाँद उतर आए तो भी आप के जैसा न लगे
बे-वफ़ाई की भी तरतीब सिखा दी उस ने
दिल भी इस तरह से तोड़ा कि शिकस्ता न लगे
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