मुझे ख़बर नहीं ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है
ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है
ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है
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रंग दिल पर वही है चाहत का
इश्क़ दोनों तरफ़ बराबर है
इश्क़ दोनों तरफ़ बराबर है
देख तेरे फ़िराक़ में जानाँ
किस तरह कट रहा दिसम्बर है
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जो भी कहने को मीर कहते हैं
बात उतनी वज़ीर कहते हैं
बात उतनी वज़ीर कहते हैं
मुत्तक़ी कर के दीन का सौदा
ख़ुद को अहले ज़मीर कहते हैं
बादशाहों से कम नहीं रुतबा
आप ख़ुद को फ़क़ीर कहते हैं
लोग आ कर फ़रेब की ज़द में
बुत-परस्तों को पीर कहते हैं
इश्क़ हो आरज़ी तो मत करना
बात इतनी कबीर कहते हैं
इश्क़ की डोर से यूँ बाँधा है
लोग मुझ को असीर कहते हैं
एक मिसरा तो कह के दिखलाओ
जिस तरह शे'र मीर कहते हैं
पीर मेरा अली है लासानी
पीर भी जिस को मीर कहते हैं
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इक कसक दिल में कहीं उठती है
बे-सबब शे'र नहीं होता है
बे-सबब शे'र नहीं होता है
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दरमियाँ फ़ासला नहीं होता
तू अगर बे-वफ़ा नहीं होता
तू अगर बे-वफ़ा नहीं होता
साफ़ कहना बुरा नहीं होता
मुझ को फिर वसवसा नहीं होता
तुम न आते अगर गुलिस्ताँ में
कोई भी गुल खिला नहीं होता
ज़र्रे ज़र्रे में है ख़ुदा पिन्हा
कोई ज़र्रा ख़ुदा नहीं होता
सच तो ये है कभी बुराई से
आदमी का भला नहीं होता
उन किताबों को हम नहीं पढ़ते
जिन
में ज़िक्र आप का नहीं होता
मुद्दई इश्क़ मर भी जाए तो
इश्क़ का खात्मा नहीं होता
मुद्दतों शख़्स जो रहा मुझ में
उस से अब राब्ता नहीं होता
तेरे कूचे से जब गुज़रता हूँ
मुझ को अपना पता नहीं होता
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