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Dr Bhagyashree Joshi

Top 10 of Dr Bhagyashree Joshi

Dr Bhagyashree Joshi

Top 10 of Dr Bhagyashree Joshi

    आरिज़ों को चूमने की ताक में रहता है हर दम
    तेरा दिलवाया हुआ झुमका भी तेरे हू-ब-हू है
    Dr Bhagyashree Joshi
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    उठा कर सर कहूँ सब से मैं हूँ उस देश की वासी
    बुलंदी के निशाँ छोड़े हैं जिस ने चाँद पर अपने
    Dr Bhagyashree Joshi
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    दर्द को अपने छुपाता शा'इरी ग़ज़लों में जो
    आह में भी वाह सुनता सच में वो शहबाज़ है
    Dr Bhagyashree Joshi
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    चूमता है वो हज़ारों फूल हर दिन बाग़ में
    हर कली को फिर भी उस भँवरे से उल्फ़त है बहुत
    Dr Bhagyashree Joshi
    7
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    रुख़्सती के दिन चुकाना होगा जुर्माना सनम
    इक दफ़ा देना पड़ेगा फिर से ये शाना सनम

    भूल कर मुझ को जो तुम ने भूल की थी इक दफ़ा
    ज़िक्र भी उस भूल का लब पर नहीं लाना सनम

    तुम सजा देना खिले सदहा गुलाबों से मुझे
    आख़िरी होगा तुम्हारा ये ही हर्जाना सनम

    जो छुपा कर आज भी रक्खे हैं ख़त संदूक़ में
    चाहते हैं उन ख़तों को साथ ले जाना सनम

    चाँद के जाने से ही रातें बदलती सुब्ह में
    जाते जाते बस यही कहता है दीवाना सनम
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    Dr Bhagyashree Joshi
    6
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    मौत आने पर बदलती, रूह अपना पैरहन
    क्या पता था रूह मुझ को, छोड़ देगी जीते जी
    Dr Bhagyashree Joshi
    5
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    ज़िन्दगी का कोई पल जब मुझ को बरहम सा लगा
    दोस्त बन कर तब मेरे तू दिल पे मरहम सा लगा
    Dr Bhagyashree Joshi
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    लकीर-ए-ज़िन्दगी का रंग हाथों में हिनाई है
    हाँ शायद इस लिए ये मौत तुझ को छू न पाई है

    निग़ाह-ए-शौक थी तुझ पर ब-मुश्किल से हटाई है
    मुख़ालिफ़ सम्त पर चलने की अब हिम्मत जुटाई है

    तिजोरी में मोहब्बत की लगा कर ताला चुप्पी का
    मुकफ़्फ़ल कर लिया दिल में तुझे चाबी छुपाई है

    ख़ुदाया खेल ये तेरा समझ पाया नहीं कोई
    मोहब्बत में शब-ए-हिज्रा ही क्यूँ लंबी बनाई है

    हटा दी तू ने जब नज़रें, नज़र सदहा उठी मुझ पर
    उठी नज़रों के आगे मैं ने फिर नज़रें झुकाई है

    गुलाबों की महक़ आती है अब भी इन किताबों से
    पढ़ाई तू मेरी, डिग्री भी तू, तू ही कमाई है
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    Dr Bhagyashree Joshi
    3
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    जो नदी मख़मूर थी,सागर की बस इक चाह में
    वो बुझाती आज है, आँसू को पी कर तिश्नगी
    Dr Bhagyashree Joshi
    2
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    मकाँ दिल को बनाने का, ये वा'दा रू-ब-रू कर के
    मकीं घर छोड़ देते हैं, ये बातें कू-ब-कू कर के

    लगी जो चोट भी तुम को, सहा मुझ से न जाएगा
    ये बातें करने वाले छोड़ जाते, दिल लहू कर के

    कभी नश्तर से जो उस ने, दिए थे घाव इस दिल पर
    वहाँ पैबन्द यादों का लगाया है, रफ़ू कर के

    नहीं सूखी हैं बेलें आज भी, दिल में मोहब्बत की
    उन्हें सींचा है अश्कों को लहू को, आब-जू कर के

    तुम्हें सच्ची मुहब्बत का, सिला मैं और क्या देती
    तुम्हें अगले जनम भी माँगती हूँ, आरज़ू कर के
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    Dr Bhagyashree Joshi
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