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ज़िन्दगी का कोई पल जब मुझ को बरहम सा लगा
दोस्त बन कर तब मेरे तू दिल पे मरहम सा लगा
दोस्त बन कर तब मेरे तू दिल पे मरहम सा लगा
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लकीर-ए-ज़िन्दगी का रंग हाथों में हिनाई है
हाँ शायद इस लिए ये मौत तुझ को छू न पाई है
हाँ शायद इस लिए ये मौत तुझ को छू न पाई है
निग़ाह-ए-शौक थी तुझ पर ब-मुश्किल से हटाई है
मुख़ालिफ़ सम्त पर चलने की अब हिम्मत जुटाई है
तिजोरी में मोहब्बत की लगा कर ताला चुप्पी का
मुकफ़्फ़ल कर लिया दिल में तुझे चाबी छुपाई है
ख़ुदाया खेल ये तेरा समझ पाया नहीं कोई
मोहब्बत में शब-ए-हिज्रा ही क्यूँ लंबी बनाई है
हटा दी तू ने जब नज़रें, नज़र सदहा उठी मुझ पर
उठी नज़रों के आगे मैं ने फिर नज़रें झुकाई है
गुलाबों की महक़ आती है अब भी इन किताबों से
पढ़ाई तू मेरी, डिग्री भी तू, तू ही कमाई है
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मकाँ दिल को बनाने का, ये वा'दा रू-ब-रू कर के
मकीं घर छोड़ देते हैं, ये बातें कू-ब-कू कर के
मकीं घर छोड़ देते हैं, ये बातें कू-ब-कू कर के
लगी जो चोट भी तुम को, सहा मुझ से न जाएगा
ये बातें करने वाले छोड़ जाते, दिल लहू कर के
कभी नश्तर से जो उस ने, दिए थे घाव इस दिल पर
वहाँ पैबन्द यादों का लगाया है, रफ़ू कर के
नहीं सूखी हैं बेलें आज भी, दिल में मोहब्बत की
उन्हें सींचा है अश्कों को लहू को, आब-जू कर के
तुम्हें सच्ची मुहब्बत का, सिला मैं और क्या देती
तुम्हें अगले जनम भी माँगती हूँ, आरज़ू कर के
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