अजब सुरूर सी चढ़ी वो आशिक़ी नई नई
हमें लगा कि हो गई ये ज़िंदगी नई नई
नई नई लगी हवा नए लगे दयार सब
नशा नया हुआ हमें थी बे-ख़ुदी नई नई
तमाम ग़म जहान के मेरे जिगर में आ बसे
यूँ मेरे दिल को मिल गई कुशादगी नई नई
ये दिल की धड़कनों का भी मुआमला अजीब है
कभी लगी हैं आख़िरी कभी कभी नई नई
कभी उतरा था आसमाँ मुझ में
खो गया जाने फिर कहाँ मुझ में
जो कभी अपने घर नहीं लौटा
है उसी शख़्स का मकाँ मुझ में
मुझ को ज़िंदा कोई नहीं मिलता
रोज़-ओ-शब उठता है धुआँ मुझ में
सब ने देखा है मुझ में इक तालाब
कोई दरिया भी है रवाँ मुझ मैं
आज वो क़ीमती है इस जहाँ में
हो गया था जो राएगाँ मुझ में
ज़िंदगी काट दूँगा तन्हा मैं
इस गुमाँ का भी है गुमाँ मुझ में
मुझसे गुज़री थी इक बहार कभी
ठहरी है अब तलक ख़िज़ाँ मुझ में
आपकी याद है बसी दिल में
रोज़ आती हैं तितलियाँ मुझ में
चीख़ता है कोई मेरे अन्दर
या'नी अब मैं ही हूँ निहाँ मुझ में
मुख़्तलिफ़ है मगर जानता कौन है
रात से लड़ गया वो दिया कौन है
जब ग़लत रास्ते आ गया काफ़िला
तब सभी पूछते रहनुमा कौन है
आपके शहर की हर ज़बाँ पूछती
ये वफ़ा क्या है और बेवफ़ा कौन है
इन नकाबों के पीछे वही चेहरे हैं
लोग सब एक से हैं जुदा कौन है
रात इक लाश ढोता रहा और सुब्ह
ढूँडता हूँ कि मुझ में मरा कौन है
पीते रहें ज़हरीले रिश्तों की शराब
अब और न दीजे झूटे वादों की शराब
है मय-कदा घर के बहुत नज़दीक में
है मय-कदे में सारे ज़ख्मों की शराब
मेरे गले से ये उतरती ही नहीं
कड़वी बहुत है तेरी यादों की शराब
कुछ यूँ शब-ए-ग़म को किया था मुख़्तसर
कल रात हमनें पी सितारों की शराब
यारों तुम्हारे जाम पानी हो गए
मुझको पिलाओ उसके हाथों की शराब
हमको दिया है शायरी ने ये नशा
हम रोज़ पीते है किताबों की शराब
अब ये गुलाब आँखों में चुभते हैं बहुत
कोई बना दे इन गुलाबों की शराब
दिन में कहीं मर जाती है ये ज़िंदगी
ज़िन्दा हमें रखती है रातों की शराब
वो मिला है हम को सफ़र यहाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं
है ये रास्ता कोई बद-ग़ुमाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं
जो मोहब्बतों में नहीं रहे हैं जो नफ़रतों में शुमार हैं
बना है उन्हीं का ही कारवाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं
जहाँ चाँदनी में है तीरगी जहाँ सुब्ह से न हो रौशनी
रहे हम उसी सर-ए-आसमाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं
किसी बात पर न मलाल है न ही दिल में कोई सवाल है
तो ये दर्द कैसा है दरमियाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं
ये उदासियाँ सभी शाम की ये जो मुश्किलें हैं तमाम सी
दे रहे हैं हम कोई इम्तिहाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं
बुझती नहीं ये प्यास है
ये दिल बहुत उदास है
कटती रहेगी ज़िंदगी
इक याद मेरे पास है
जाते हुए ही फेंक दे
मन में जो भी भड़ास है
ग़म दिल के सब उतर सके
इक जाम है गिलास है
आँखों पे पर्दे हैं यहाँ
सरकार बे-लिबास है
याद थे जो रस्ते वो रस्ते ग़लत थे
सपनों पे चलते थे और सपने ग़लत थे
अब समझ आता हैं उनको देख कर ये
फ़ैसलों में अपने हम कितने ग़लत थे
साथ उसके थे भरम वाले वो दिन थे
अच्छे थे वो दिन मगर वैसे ग़लत थे
दिल भी पागल हैं निभाता था मरासिम
दिल के अक्सर फ़ैसले होते ग़लत थे
अब मिला करते हैं मयखानों में वो लोग
जो कभी कहते कि मयख़ाने ग़लत थे
क्या हाल मेरा हो गया तेरे बग़ैर
मैं तुझ में कितना खो गया तेरे बग़ैर
जो याद आया बाहो का जादू तिरा
मैं जागा जागा सो गया तेरे बग़ैर
ये बे-वफ़ाई रात हम से हो गई
सब दाग़-ए-दिल वो धो गया तेरे बग़ैर
तब ज़िंदगी की शाख़ पे बस फूल थे
अब काँटे कोई बो गया तेरे बग़ैर
ये मुझे क्या हुआ क्या से क्या बन गया
वक़्त के साथ पत्थर हवा बन गया
कल शब-ए-हिज्र का मैं मुसाफ़िर हुआ
रात मेरा सफ़र इन्तेहा बन गया
जो ग़म-ए-आशिक़ी का है मारा यहा
मय का कतरा भी उसकी दवा बन गया