जितना भी हम जिए उतने ही परेशान रहे
हो गए ख़ाक तो भी दर्द से सोज़ान रहे
ज़िन्दगी जी न सकूँगा कभी भी चैन से मैं
मेरे सीने में अगर ज़िंदा ये अरमान रहे
हम तलबगार-ए-रिहाई-ए-मुहब्बत थे मगर
उम्र भर के लिए हम क़ैदी-ए-ज़िंदान रहे
बुत-परस्ती का सिला तो हमें मिलना ही था
साँस चलती थी मगर जिस्म से बे-जान रहे
बादा-ए-नाब है ये ज़िन्दगी या ख़ून-ए-जिगर
कोई बतला दे तो ता-उम्र ये एहसान रहे
एक भी गुल न खिला मेरे इन अश्कों से कभी
जाने कितने मेरी आँखों में बयाबान रहे
मिस्ल-ए-तहरीर है ये हुस्न या मिस्ल-ए-नग़्मा
जितना भी देखा तुझे उतने ही हैरान रहे
जब तुमने मेरा नाम पुकारा ख़ुशी ख़ुशी
मैं हो गया था तब से तुम्हारा ख़ुशी ख़ुशी
दरिया के जैसी तुम में नज़ाकत है इसलिए
दरिया में अपना पैर उतारा ख़ुशी ख़ुशी
चौबीस घंटे में से मुझे दे दो जितना भी
कर लूँगा उतने में ही गुज़ारा ख़ुशी ख़ुशी
माँगा तुम्हें ख़ुदा से तो उस वक़्त जान-ए-जाँ
टूटा फ़लक से एक सितारा ख़ुशी ख़ुशी
मुझको है रहनुमा की ज़रूरत सो आज तुम
मेरा भी हाथ थाम लो यारा ख़ुशी ख़ुशी
बेहतर है उसके इश्क़ में फ़ुर्क़त न हो कभी
मैं इसलिए ही जंग में हारा ख़ुशी ख़ुशी
मैं ज़िन्दगी की मार से गिरने लगूँ अगर
तो यार मुझको देना सहारा ख़ुशी ख़ुशी
जिस हुस्न को ग़ज़ल ये सुना दोगे तुम 'मुकेश'
हो जाएगा वो यार तुम्हारा ख़ुशी ख़ुशी