किसी का गर सुकूँ हो तो किसी का मसअला हो तुम
दवा हो तुम, दुआ हो तुम, मरज़ हो तुम, बला हो तुम
अधूरी मुद्दतों से इक कहानी लिख रहा हूँ मैं
फ़रेब, इश्क़,आग और पानी लिख रहा हूँ मैं
कि मिलने आ रहे हैं फिर न मिलने की जो शर्त पर
हाँ नाम उनके ही ये ज़िंदगानी लिख रहा हूँ मैं
तेरी अंँगड़ाई के आलम का ख़याल आया जब
ज़ेहन-ए-वीरांँ में खनकने लगे कंगन कितने
दिल की ख़ातिर एक रिश्ते को बचाने के लिए
आग मैंने ही लगा ली ख़ुद मिरे घरबार में
तेरे आने की ख़ुशी है न है फ़ुर्क़त का ग़म
ग़म ये है बीत गये प्यार के सावन कितने
सजा दूँ मांँग मैं तेरी लहू से आज मैं अपने
बुरा मानो अगर मेरे न तुम सरकार, होली में
तिरंगा दिल में है लबों पे हिंदुस्तान रखता हूँ
सिपाही हूँ हथेली पे मैं अपनी जान रखता हूँ
गली हर इक मोहब्बत की अंधेरी हो नहीं सकती
सिवा मज़हब के मजबूरी तो तेरी हो नहीं सकती
किया था इश्क़ मैंने जब तभी ये जानता था मैं
तू लड़की है 'अलीगढ़' की तू मेरी हो नहीं सकती