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ऐ सखी बे-तहाशा मोहब्बत तिरी मुझ को हर रस्म से मावरा थी मगर
उम्र तन्हा बिताने से अच्छा ये था तुम सफ़र में कोई हम-सफ़र देखते
उम्र तन्हा बिताने से अच्छा ये था तुम सफ़र में कोई हम-सफ़र देखते
ना-मुकम्मल सभी ख़्वाब हैं आज तक फिर भी बस एक दिल की ख़ुशी के लिए
चश्म-ए-हैराँ से बुनते किसी ख़्वाब को फिर उसी ख़्वाब को रात भर देखते
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तेरा ख़ामोश हो जाना बड़ा महसूस होता था
मैं तुझ से क्या कहूँ अब और क्या महसूस होता था
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