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अपना ही एक मौसम लिए फिरते हैं
लोग जो दिल को पुर-ग़म लिए फिरते हैं
लोग जो दिल को पुर-ग़म लिए फिरते हैं
चारा-गर जैसे हैं ये सुख़न-वर सभी
सबके ज़ख़्मों का मरहम लिए फिरते हैं
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ख़्वाब ऐसा जो मुकम्मल भी, नहीं भी
इश्क़ में वो मेरे पागल भी, नहीं भी
इश्क़ में वो मेरे पागल भी, नहीं भी
ज़िंदगी गर इम्तिहाँ लेती रहेगी
इम्तिहाँ होंगे मुसलसल भी, नहीं भी
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