मैं उस को अपना सब कुछ मानता था
मेरा होना भी जिस का मसअला था
मोहब्बत ख़त्म होने जा रही थी
वो मेरे साथ अब उकता रहा था
मेरी चीखें भी सुन के वो न लौटा
जो आहट तक मेरी पहचानता था
रवानी ख़ून की कम हो चुकी थी
गले मिलना ज़रूरी हो गया था
वो मुद्दत बा'द मुझ से मिल रही थी
मैं उस को देखते ही रो पड़ा था
मेरे सब ज़ख़्म यूँ तो भर चुके थे
मगर वो मुझ
में अब भी रह गया था
गँवा के उम्र अपनी सारी 'अरहम'
दुआ मरने की अब मैं कर रहा था
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