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चार-सू जब चारा-गर हैं घाव क्यूँ जाता नहीं
क्या सितम है दर्द मेरा चैन क्यूँ पाता नहीं
क्या सितम है दर्द मेरा चैन क्यूँ पाता नहीं
एक रूठी सी हँसी है होंठ पे ठहरी मिरे
एक आँसू ख़ुशनुमा है आँख से जाता नहीं
शक़्ल तेरी भी ज़रा बदली हुई सी लग रही
मिल रहा हूँ मैं भी यूँ जैसे कोई नाता नहीं
आज बादल के सहारे उस ने ख़त भेजा हमें
आसमाँ क़ासिद है कैसा लफ़्ज़ बरसाता नहीं
चार घंटे तीस मिनटों में मिलो उस ने कहा
बदनसीबी के घड़ी का चल रहा काँटा नहीं
मेरा हाफ़िज़ मेरा मुर्शिद ' शान ' तू है बन गया
इश्क़ सजदे से जुदा मुझ को नज़र आता नहीं
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किया था इश्क़ तू ने यार सब से
वफ़ा को गिनतियों ने मार डाला
वफ़ा को गिनतियों ने मार डाला
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