Firdous khan

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    इस वतन में छोटी सी बुलबुल के हूँ मानिंद मैं
    मेरा मज़हब कुछ भी हो पर हूँ तो सारा हिंद मैं

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    मुझे तुम फूल देते हो मेरे किस काम के हैं ये
    है सुन्दर पर महक इनमें तुम्हारी तो नहीं आती

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    वो डर जाता है इक मासूम बच्चे की तरह बिलकुल
    मैं जब भी ख़्वाब में उसको अकेला छोड़ जाती हूँ

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    साॅरी उसने मुझे कहा है फिर
    यानी अब कुछ तो हादसा है फिर

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    जलती उदास आँखों में पिघली नमी हूँ मैं
    यानी के सूनी रातों में तेरी कमी हूँ मैं

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    सब फूल क्यों उदास थे ये क्या पता तुम्हें
    क़िस्मत तो है गुलाब की उसने छुआ तुम्हें

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    सुनो जानाँ तुम्हारे लब पे मय का एक भी क़तरा
    मेरी आँखों की है तौहीन और नाकाबिल-ए-बर्दाश्त

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    आदमी तू बड़ी नेमत है इक औरत को मगर
    ज़िन्दगी जीने की ख़ातिर तेरी दरकार नहीं

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    कहा था ये उसने है दलदल उदासी
    उसी से मिली फिर मुसलसल उदासी

    मोहब्बत की खुशियाँ है उसके हवाले
    मेरे हिस्से आई मुक़म्मल उदासी

    तब्बसुम मेरे लब पे सिसकी है मेरी
    मेरी उजड़ी आँखों का काजल उदासी

    किया इश्क़ तो फिर कफ़ारा नहीं कुछ
    मोहब्बत के मारो का है हल उदासी

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    यूँ तेरी राह तकते तकते सुन
    मेरी आँखों में पड़ गए जाले

    अबके बारिश कहीं मेरी छत से
    तेरा एहसास ही न धो डाले

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