क़फ़स को तोड़ के जब भी असीर निकलेगा
हमारे खोल के अंदर से मीर निकलेगा
धुआँ है राख है और ढ़ेर है चिताओं का
यहीं से नाचता गाता कबीर निकलेगा
किसी ने प्यार जताया जता के छोड़ दिया
हवा में मुझको उठाया उठा के छोड़ दिया
किसे सिखा रहे हो इश्क़ तुम नए लड़के
ये राग हमने मियाँ गा बजा के छोड़ दिया
मुहब्बत में पड़ा है एक जोगी
वो लड़की अप्सरा जैसी ही होगी
बने हम राम होगी रामलीला
बताओ तुम वहाँ सीता बनोगी
कोई सवाल न करना फ़क़त समझ लेना
समझ सको जो सही से ये ख़त समझ लेना
जो गिर पड़े हैं कहीं जान ख़त के आखिर में
उन आँसुओं को मेरा दस्तख़त समझ लेना
कहीं जगह न मिले मेरे दिल में आ जाना
तू मेरी छत को भी अपनी ही छत समझ लेना
मैं अबकी बार भी तुमसे सही कहूँगा सब
तुम अब की बार भी मुझको ग़लत समझ लेना
बग़ैर लौ के दिया भी दिया नहीं रहता
सो वक़्त रहते मेरी अहमियत समझ लेना
तुझे मैं शेर सुनाता हूँ जो मुहब्बत के
तू मेरी दोस्त इसे, इश्क़ मत समझ लेना
दर्द देंगे वो सिसकियाँ देंगे
हम हैं काग़ज़ वो क़ैंचियाँ देंगे
जुगनूओं ने शराब पी ली है
अब ये सूरज को गालियाँ देंगे
आ गई इश्क़ पे वो नौबत अब
डाकिये तेरी चिट्ठियाँ देंगे
मेरे बीमार ज़र्द चेहरे को
अपने होंठों की सुर्ख़ियाँ देंगे
हाँ सुना है वो फूल जैसी है
उस को तोहफ़े में तितलियाँ देंगे
आप जो बैठने नहीं देते
आप इक रोज़ कुर्सियाँ देंगे