सच कह रहीं हूँ मुझ को मुहब्बत हुई नहीं
तस्वीर ये वही है जो मुझ से बनी नहीं
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मैं आग इश्क़ की फिर से बुझा के आई हूँ
मैं जानती हूँ किसी को बचा के आई हूँ
मैं जानती हूँ किसी को बचा के आई हूँ
गले लगा के मुझे रो रही थी तन्हाई
सो मैं भी आँख से आँसू बहा के आई हूँ
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नफ़रतों में किसी से इश्क़ किया है हम ने
फूल को छोड़ के कांटो को चुना है हम ने
फूल को छोड़ के कांटो को चुना है हम ने
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दीप कोई वहाँ पर जला ही नहीं
उस के दिल में कभी कोई था ही नहीं
उस के दिल में कभी कोई था ही नहीं
मैं ने माँगा था रब से उसे इस लिए
वो मुसलसल किसी का हुआ ही नहीं
दो दिवारों में पहले लड़ाई हुई
फिर दरारों से दामन छुटा ही नहीं
साथ मेरे अजब हादसा हो गया
वो हुआ सबका मेरा हुआ ही नहीं
एक तस्वीर से मैं ने तस्वीर ली
शख़्स दो है मगर एक था ही नहीं
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साथ उस का जावेदाना चाहिए
या'नी मुझ को क़ैद-खाना चाहिए
या'नी मुझ को क़ैद-खाना चाहिए
कब तलक बन कर मुसाफ़िर ही रहे
अब हवा को भी ठिकाना चाहिए
इक घड़ी को भी नहीं रुकती नदी
तुम को भी मिलना-मिलाना चाहिए
हाल पर मेरे कभी हंँसता नहीं
आईने से दिल लगाना चाहिए
हर किसी को बे-दिली हासिल नहीं
लुत्फ़ इनका भी उठाना चाहिए
सब नसीहत है यहाँ सच्ची मगर
इश्क़ में मिटना-मिटाना चाहिए
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तुमपे सोचा है जान दे देंगे
अब के ये इम्तिहान दे देंगे
अब के ये इम्तिहान दे देंगे
इश्क़ हम को हुआ नहीं तुम से
हम ये झूठा बयान दे देंगे
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