ऐसा सबके साथ अक़्सर होता है
दिल में अनजाना सा इक डर होता है
ज़िन्दगी से कोई शश्दर होता है
सरकशी में कोई ख़ुदसर होता है
चार दिन की ज़िन्दगी है ये मगर
ख़्वाहिशों का लाव-लश्कर होता है
है तमन्ना हँस के गुज़रे ज़िन्दगी
क्योंकि ग़म का दौर दूभर होता है
जीना है तो मौत से डरना ही क्यों
जो नहीं डरता सिकंदर होता है
जिसने समझी हो फ़क़त रूहानियत
इक वही इंसान बेहतर होता है
बस जियो ज़िन्दादिली से ज़िन्दगी
मौत का दिन तो मुकर्रर होता है
ज़िन्दगी यूँ बिता रहा हूँ मैं
दूर ख़ुद से ही जा रहा हूँ मैं
कल को बेहतर बनाने की ख़ातिर
आज को भी गँवा रहा हूँ मैं
ट्यूशन जाना सिर्फ़ बहाना होता था
मेरा मक़सद उससे मिलना होता था
शायद आ कर मुझसे वो कुछ पूछ ही ले
इसलिए मुझको पढ़ के जाना होता था
अब बहुत दूर आ चुका हूँ मैं
तुझको दिल से भुला चुका हूँ मैं
मत मुझे ढूढ़ अपने अंदर तू
तेरे दिल से तो जा चुका हूँ मैं
अब किसी से नहीं मुहब्बत है
उसको दिल से मिटा चुका हूँ मैं
ग़र ख़ताएँ बहुत हुईं मुझसे
तो सज़ाएँ भी पा चुका हूँ मैं
तू परेशाँ न हो ज़रा सा भी
सब लिखे ख़त जला चुका हूँ मैं
तेरी तस्वीर आज गंगा में
साथ अपने बहा चुका हूँ मैं
"ज़िंदगी"
ये रुख़्सती भला रुख़्सती कहाँ है
तुझसे बिछड़ूँगा जानूँगा ज़िंदगी कहाँ है
नशेमन टूट-टूट कर बिख़रा है जैसे
शाम-ए-ग़म मुख़्तसर सी कहाँ है
सब्र करूँ इन्तिज़ार करूँ रोऊँ जान दे दूँ
तुम्हें मेरी बातों पर एतिबार कहाँ है
ख़फ़ा तो कर देगा न वो जाँ-नशीं
वो जो इत्मीनान से पूछ रहा दर्द कहाँ है
तेरे बाद भी जिए जा रहे हैं हम
तुम भी कहते थे कुछ भी मुश्किल कहाँ है
हालातों के बर-अक्स हम फ़क़त तेरे रहे
मेरी बेख़ुदी मेरी बेवसी मेरा असासा कहाँ है
रईसी तुम्हारी के चर्चे हैं हर ज़बान पर
बताओ मेरे हिस्से की तसल्ली दिलासा कहाँ है
“शाख़”
एक ज़र्द सी शाख़ राख कर जा रहा हूँ तेरे लिए
जब इस शाख़ पर फूल खिल जाएँगे
और ज़िंदगी की रेखा सब्ज़-रंग होगी
तब मैं नहीं रहूँगा मगर तुम्हें ये महसूस होगा
कि ये मेरी ही ख़ुश्बू है मेरा ही है ये रंग-ए-बहार
मिट्टी बग़ैर पानी बग़ैर ज़िंदा रहेगी ये शाख़
ये कभी हुआ करती थी मेरी रूह के शजर की आँख
आँखों को दिखाई दे ऐसी बारिश की ज़रूरत नहीं इसे
इस की इक उम्र गुज़र चुकी है धूप में उड़ाते हुए ख़ाक
ये शाख़ किसी शाही फूलों की नहीं है बिल्कुल
मगर इतनी भी बेकार नहीं की इस पे कोई फूल ही न आए
हर एक चीज़ के लिए चाहिए होता है एक वक़्त
और बस इसी चीज़ की कमी थी हम दोनों की ज़िंदगी में फ़क़त
अपनी सारी हयात बीत गई बादलों की परछाइयाँ गिन ने में
किसी ने अगर पूछा तुम से तो बेशक़ कहना
कभी कभी ऐसे बेकार काम भी करने ज़रूरी हैं
अपने ही रूह के छाले कभी सिलने में कभी छिलने में
सच कहूँ तो हरी-भरी ही शाख़ देनी थी तुम्हें मगर
ये पता न था की ख़्वाहिशों से ज़्यादा साँसे कम पड़ जाएगी
मगर ठीक है अब जो हुआ सो हुआ,अब तो तुम्हें,
बहार और पतझड़ की बहुत अच्छे से समझ आएगी
इस शाख़ की पोरों में अपनी कुछ परछाइयाँ रख दी हैं मैंने
जैसे सुकूत-ए-ज़िंदगी में दिल की कुछ बे-ताबियाँ रख दी हैं मैंने
कहीं ऐसा न हो कि मैं दूर ख़ुद अपने आप से हो जाऊँ
मेरी हस्ती के हंगामों में कुछ तन्हाइयाँ रख दी हैं मैंने
मेरे शाहकार मेरे अफ़्कार हो जाएँ न फ़र्सूदा ज़माने में
इस लिए निगाहों में तुम्हारी कुछ गहराइयाँ रख दी हैं मैंने
मेरा हर इज़्तिराब-ए-दिल निशाँ मंज़िल का बन जाए
तमन्नाओं में तेरी हिज्र की अंगड़ाइयाँ रख दी हैं मैंने
किसी भी ग़ैर की जा़निब नज़र नहीं उठेगी मेरी
मेरी निगाहों में तुम्हारी सब रानाइयाँ रख दी हैं मैंने
"हिसाब"
मेरे चुभते क़िस्सों की किताबों में
दबे मिलेंगे तुम्हें कुछ गुलाब भी
मैंने इश्क़ में यादों के साथ
रखा है सारा हिसाब भी
जिस महफ़िल में हया लुटाई
उसको है मेरा आदाब भी
रस रहे शायरियों तक बस
मेरी नज़्मों से टपके शराब भी
जलते हैं शायर शायद इसलिए
जो मैं आफ़ताब के साथ लिखता चाँद भी
फ़क़त जिस्म तक न रहे इश्क़ हमारा
तू सीने से लगा सके मेरी लिखी नज़्म भी
याद
मुझे तुम याद आते हो
बहुत ध्यान भटकाते हो
पढ़ नहीं पाता सही से
पन्नों पर उतर आते हो
नींद का तो पूछो ही मत
सुबह होने तक जगाते हो
सुनो आईना बनों ना मेरा
जैसे तुम मुझे बनाते हो
तुम्हारी साँसों से तुम जानाँ
सारा जहाँ महकाते हो
शौक़ से उड़ते क्यूँ नहीं तुम
ख़्वाहिशें दिल में दबाते हो
तुम सा हसीं नहीं कोई यहाँ
मान लो ना क्यूँ इतराते हो
चले आओ ना छत पर
जैसे! हर बार आते हो
'शिवम्' से मिलने की ख़ातिर
'शिवम्' से ही शर्माते हो