
जब उस के अश्क से ये हाथ सनता जा रहा था
हमारे दरमियाँ कुछ था जो छनता जा रहा था
ख़ुशी से छोड़ दी फिर एक दिन उस की गली भी
मैं उस से मुख़्तलिफ़ हूँ जैसा बनता जा रहा था
— Ankit Yadav
Other sher from the same pen
Shers of aansoo.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling