मुझे वो ही नज़र आता जिधर मेरी नज़र जाए
भला ऐसे में दिल उस को भुलाकर भी किधर जाए
भला ऐसे में दिल उस को भुलाकर भी किधर जाए
बड़े नादान हो गर इश्क़ को आसाँ समझते हो
नशा ऐसा नहीं है ये जो पल भर में उतर जाए
तसव्वुर में नज़र आता फ़क़त चेहरा मुझे जिस का
सँवरने बैठ जाए वो तो आईना बिखर जाए
मैं तन्हाई का मारा हूँ मेरा हाकिम मेरा महबूब
बिना उस के छुए हालत मेरी कैसे सुधर जाए
मुबारक हो अगर कुछ ग़म मुयस्सर हैं तुम्हें यारों
उदासी ने भी जिस का साथ छोड़ा वो किधर जाए
उसे कह दो नहीं होती कोई बंदिश मुहब्बत में
मेरा हमराह चाहे छोड़कर जाना अगर जाए
लुटी है बाग़ की ख़ुशबू लुटी है ज़ीस्त की रौनक़
करो सब इल्तिजा मौसम ये जल्दी से गुज़र जाए
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क्या बताऊँ क्या हुनर था बाग़बाँ में
क्या महक घोली हवा-ए-गुलसिताँ में
क्या महक घोली हवा-ए-गुलसिताँ में
जिन के दिल में जुगनुओं सी रौशनी थी
आज बन तारे सजे हैं आसमाँ में
राह चलते जाने कितने शख़्स बदले
सब मेरे हमदर्द ही थे कारवाँ में
घर उजड़ने का मैं उस दिन दर्द समझा
जब लगी ख़ुद आग मेरे आशियाँ में
आज तक इस बात पर हैरान हूँ मैं
था फ़क़त किरदार तेरी दास्ताँ में
इश्क़ में था हार भी मंज़ूर लेकिन
आ सके अव्वल नहीं इस इम्तिहाँ में
वो बहुत ख़ामोश रहता है हमेशा
है अजब सी बात तेरे हम-ज़बाँ में
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हम ने चाहा नहीं ये न हो वो न हो
तुम हमारे रहो हो न हो हो न हो
तुम हमारे रहो हो न हो हो न हो
आज दुनिया क़दम चूमती फिर रही
हो सके कल हमारी तवज्जोह न हो
तुम कहाँ के बचोगे बताओ ज़रा
कल अगर इश्क़ से इश्क़ मुझ को न हो
ऐश की ज़िंदगी हर किसी की दुआ
काश ऐसा कभी शौक़ तुम को न हो
इश्क़ के खेल में फिर न कोई मज़ा
हार इस
में तुम्हारी अगर जो न हो
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हादसा ख़ैर कोई हुआ भी नहीं
वो गया और दिल से गया भी नहीं
वो गया और दिल से गया भी नहीं
आशिक़ी ने दिए तोहफ़े में मुझे
ज़ख़्म ऐसे कि जिन की दवा भी नहीं
चाँद इक रोज़ ऐसे गया रूठ कर
इस गली में कभी फिर दिखा भी नहीं
मैं उसे क्या कहूँ तुम बताओ कि वो
छोड़कर भी गया बे-वफ़ा भी नहीं
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आसमाँ को चूम कर आया ज़मीं पर
जीत आया मैं जहाँ तेरे यक़ीं पर
जीत आया मैं जहाँ तेरे यक़ीं पर
अस्लियत में मैं तुम्हारा था दिवाना
कह दिया तुम ने मुझे पागल कहीं पर
रास्ते आ कर जहाँ मिलते सभी हैं
लोग अक्सर छूट जाते हैं वहीं पर
दस्तकें दर पर तिरे देता रहा मैं
ज़िंदगी भर दर-ब-दर भटका नहीं पर
ज़ख़्म तुम ने जो दिए भरते नहीं थे
क्यूँ चलाया आज फिर ख़ंजर हमीं पर
दिल है मेरा या फ़क़त शीशा है कोई
जो भी चाहे तोड़ देता है कहीं पर
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